सार
2024 के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट ऐसे आए हैं कि भाजपा एनडीए के सहयोगी दलों की मदद के बिना सरकार नहीं बना सकती। भाजपा मुख्यरूप से TDP और JDU जैसे सहयोगियों पर निर्भर है।
नई दिल्ली। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को अकेले बहुमत मिली थी। भाजपा ने एनडीए में शामिल सहयोगी दलों को सरकार का हिस्सा बनाया, लेकिन उसे उनपर निर्भर रहने की जरूरत नहीं थी। पिछले साल विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA के बनने तक भाजपा ने अपने कई सहयोगियों को खो दिया। इनमें सबसे पुराने सहयोगी शिरोमणि अकाली दल (2020) और अविभाजित शिवसेना (2019) शामिल हैं।
18 जुलाई 2023 को एनडीए की बैठक हुई। कहा गया कि इसमें 28 दल शामिल हुए। उस समय INDIA बलॉक में 18 दल शामिल थे। इसके बाद के महीनों में NDA में टीडीपी, जदयू और TIPRA मोथा जैसे नए सदस्य शामिल हुए, लेकिन AIADMK जैसे कुछ सहयोगी अलग हो गए।
2024 के लोकसभा चुनाव के रिजल्ट के बाद अब भाजपा को एनडीए के सहयोगी दलों की जरूरत पिछले 10 साल से अधिक है। बिना सहयोगियों की मदद से भाजपा के पास सरकार बनाने लायक संख्या बल नहीं है। यहीं वजह है कि अब एक बार फिर एनडीए की प्रमुखता केंद्र में आ गई है। सरकार बनाने के लिए भाजपा मुख्यरूप से TDP और JDU जैसे सहयोगियों पर निर्भर है। अब सवाल यह है कि ये क्यों BJP के साथ बने रहे सकते हैं और किस वजह से दूर हो सकते हैं।
तेलुगु देशम पार्टी
टीडीपी पहली बार 1996 में एनडीए में शामिल हुई थी। उस समय चंद्रबाबू नायडू युवा नेता थे। 2018 में चंद्रबाबू नायडू एनडीए से अलग हो गए थे। इससे उनकी पार्टी को काफी नुकसान उठाना पड़ा। 2018 में तेलंगाना विधानसभा में टीडीपी सिर्फ 2 सीटों पर सिमट गई। 2019 में आंध्र प्रदेश विधानसभा में यह सिर्फ 23 सीटों पर सिमट गई थी।
फरवरी 2024 में टीडीपी फिर से एनडीए में शामिल हो गई। आम चुनाव में जहां भाजपा को भारी नुकसान हुआ। वहीं, टीडीपी को जबरदस्त लाभ हुआ। यह आंध्र प्रदेश की 175 सीटों में से 135 जीत गई। टीडीपी को लोकसभा की 16 सीटों पर जीत मिली। यह NDA में भाजपा के बाद दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। अब नायडू लगभग दो दशकों में पहली बार किंगमेकर की भूमिका निभाने के लिए तैयार हैं।
INDIA गठबंधन के नेताओं की ओर से नायडू को लगातार फोन किए जाने की खबरें आ रही हैं। टीडीपी भाजपा से कई प्रमुख मंत्रालयों की मांग कर सकती है। कम से कम दो ऐसे महत्वपूर्ण कारण हैं जो पार्टी को एनडीए के साथ बनाए रख सकते हैं।
1- आंध्र प्रदेश के विभाजन और वाई एस रेड्डी की मृत्यु के बाद पार्टी टूटने के बाद कांग्रेस अभी तक आंध्र प्रदेश में अपनी खोई हुई लोकप्रियता हासिल नहीं कर पाई है।
2- आंध्र प्रदेश में भाजपा और टीडीपी मिलकर चुनाव लड़े। पीएम मोदी ने टीडीपी के प्रत्याशियों के लिए प्रचार किया। अगर अब डीपीडी जनादेश के खिलाफ जाती है तो उसे भविष्य में राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में नुकसान उठाना पड़ सकता है।
दूसरी ओर टीडीपी की उम्मीदों के अनुसार अगर मंत्रालय नहीं मिलते हैं तो वह एनडीए से दूर भी हो सकती है।
जनता दल यूनाइटेड
जदयू नेता नीतीश कुमार पहले कई बार NDA में शामिल हो चुके हैं और इसे छोड़ चुके हैं। लोकसभा चुनाव 2024 से कुछ समय पहले तक नीतीश NDA से बाहर थे। भाजपा को फिर से केंद्र में सरकार बनाने से रोकने के लिए उन्होंने विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA बनाने में बड़ी भूमिका निभाई। उनकी पहले से INDIA बन गया, लेकिन बाद में वह खुद INDIA गठबंधन से अलग होकर NDA में शामिल हो गए।
नीतीश अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार में अहम भूमिका में थे। वह रेल मंत्री भी रहे। 2014 के आम चुनाव से पहले चीजें बिगड़ने लगीं थी। नीतीश ने नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने का कड़ा विरोध किया और 2013 में एनडीए छोड़ दिया। उन्होंने राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों को साथ लेकर महागठबंधन बनाया। इसने 2015 में बिहार में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा को हराया। नीतीश 2017 में महागठबंधन से अलग हो गए और NDA में चले गए। इसके बाद 2022 में महागठबंधन में वापस आ गए, लेकिन 2024 में फिर से एनडीए में शामिल हो गए।
नीतीश कुमार लोकसभा चुनाव में 12 सीटें जीतकर फिर से ताकतवर हो गए हैं। भाजपा को सरकार बनाने के लिए तीसरी सबसे बड़ी एनडीए पार्टी जेडी(यू) की आवश्यकता होगी। नीतीश के रिकॉर्ड को देखते हुए उनके समर्थन से केंद्र में स्थिरता आने की संभावना कम है। नीतीश भाजपा से एक से अधिक मंत्री पद मांग सकते हैं। मांग पूरी नहीं होने पर वह NDA से अलग भी हो सकते हैं।
लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)
चिराग पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को पांच सीटों पर जीत मिली है। वह खुद को पीएम मोदी का हनुमान बताते हैं, इसलिए उनके एनडीए के प्रति वफादारी जारी रखने की पूरी उम्मीद है। वह एक या अधिक प्रमुख मंत्री बनाए जाने की मांग कर सकते हैं।
शिवसेना (शिंदे)
शिवसेना लंबे समय तक भाजपा की गैर-संघी “हिंदुत्व” सहयोगी रही है। भाजपा और शिवसेना का गठबंधन 1984 में शुरू हुआ था। 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के बाद यह गठबंधन टूटा था। 2022 में शिवसेना टूट गई थी। शिवसेना का शिंदे गुट भाजपा के साथ गठबंधन में है। उसे सात सीटों पर जीत मिली है। शिवसेना के उद्धव ठाकरे गुट को 9 सीटों पर जीत मिली है। शिव सेना (उद्धव ठाकरे) विपक्षी दलों के गठबंधन INDIA में है। इसलिए शिवसेना (शिंदे) के विपक्षी गठबंधन में शामिल होने की उम्मीद नहीं है। दूसरी ओर शिवसेना (शिंदे) भाजपा के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार चला रही है। सीएम एकनाथ शिंदे हैं। NDA से अलग होने पर उसे महाराष्ट्र की सत्ता से भी बाहर जाना होगा।