नई दिल्ली. निर्भया (Nirbhaya) को 7 साल 3 महीने और 4 दिन बाद इंसाफ मिला। 20 मार्च 2020 की सुबह 5.30 बजे, 4 दोषियों को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया। निर्भया केस में कुल 6 दोषी थे, जिसमें से मुख्य दोषी राम सिंह साल 2013 में तिहाड़ जेल (Tihar jail) में फांसी के फंदे से लटका मिला था। एक दोषी नाबालिग था, जिसे 3 साल जेल में रखने के लिए सुधार गृह में छोड़ दिया गया। 16 दिसंबर 2012 की रात हुई दरिंदगी का इंसाफ मिलने में 2651 दिन लग गए। इस वारदात के बाद पूरे देश में दोषियों के लिए फांसी की मांग की गई, लेकिन सबसे ज्यादा साहस निर्भया की मां आशा देवी पांडे (Asha Devi Pandey) ने दिखाया। उन्होंने एक लंबे वक्त तक बेटी के लिए इंसाफ की लड़ाई लड़ी। आखिरकार इंसाफ की वह सुबह आ ही गई।  

निर्भया के दोषियों को फांसी दे दी गई है। Asianet News ने निर्भया की मां आशा देवी पांडे से बात की। उनसे जानना चाहा, दोषियों की मौत के बाद की पहली सुबह कैसी है? बेटी को इंसाफ मिलने के बाद अब आगे क्या करेंगी? इंसाफ की लड़ाई में सबसे ज्यादा किसने साथ दिया? निर्भया की वो आखिरी शब्द, जो आज तक उनके कानों में गूंजती हैं?      

सवाल- सात साल के लंबे इंतजार के बाद दोषियों को फांसी हुई। बेटी को इंसाफ मिलने के बाद की पहली सुबह आपके लिए कैसी है? 
जवाब- फाइनली आज तसल्ली हुई। चारों दोषियों को फांसी हुई। कोर्ट ने एक बार फिर से कन्फर्म किया। उन्हें फांसी हुई।  

सवाल- इतने लंबे इंतजार के आज की सुबह को आप कैसे देखती है? सबसे पहले क्या करना चाहेंगी?
जवाब- आज हमारे जीवन का बहुत बड़ा दिन है। आज का सूरज इतिहास में लिखा जाएगा। आज इंसाफ का सूरज उगा है। एक बच्ची को 20 मार्च को इंसाफ मिला था, जिसके साथ 7 साल पहले क्राइम हुआ था। खासकर हमारे उन बच्चियों को, महिलाओं को एक उम्मीद जगेगी। उन्हें लगेगा कि निर्भया को इंसाफ मिला तो हमें भी इंसाफ मिलेगा। कहीं न कहीं हमारी न्याय व्यवस्था पर लोगों को भरोसा बढ़ेगा। देर से ही सही, लेकिन न्याय जरूर मिला। 

सवाल- आज निर्भया के दोषियों को फांसी हो गई। आज सबसे पहला काम क्या करेंगी? क्योंकि आपके लिए यह एक नई सुबह है। 
जवाब- सबसे पहले मैं मीडिया में ही धन्यवाद देती हूं, क्योंकि मीडिया के माध्यम से ही सब लोग जुड़े हुए हैं। 

सवाल- निर्भया के आखिरी शब्द क्या थे, जो आज तक आपने कानों में गूंजते हैं? आप को आज भी याद आते हैं। 
जवाब- हमारे लिए निर्भया की याद वहां तक सीमित है, जो 7 साल पहले उसके साथ क्राइम हुआ था। जिस तरह से वह 12-13 दिन तक हॉस्पिटल में मौत और जिंदगी से जूझती रही।  
एक-एक सांस गंवाती रही। 12-13 दिन तक जिंदा तो रही, लेकिन एक बूंद पानी के लिए तरस गई। मैं जब तक जिंदा रहूंगी, तब तक इस बात को नहीं भूल पाऊंगी। 

सवाल- वह शब्द क्या थे, जो आज भी आपको सुनाई देते हैं?
जवाब- वही आखिरी बात है, जब उसको होश आया। उसने मुझसे पानी मांगा। भाई से मांगा। कहा, हमें पानी पिला दो। भूख लगी है कुछ खिला दो। लेकिन डॉक्टरों ने मना कर दिया। उन्होंने कहा, इस समय पानी तक नहीं दे सकते हैं। खाना तो दूर की बात है। 2 दिन 3 दिन उसने मांगा, लेकिन जब उसे पता चल गया कि नहीं मिलेगा तो चुपचाप हो गई। कहीं न कहीं यह हमेशा हमें तकलीफ देता है। और जब ये चीज जहन में आती है तब घुटन होती है। बच्ची जिंदा तो रही लेकिन एक बूंद पानी के लिए तरस गई। 

सवाल- जब पहली बार पता चला कि आपकी बेटी के साथ ऐसी घटना हुई है तो आपको कैसा लगा?
जवाब- पुलिस ने मुझे फोन किया। मुझे लगा कि कोई दुर्घटना हुई है। सब ठीक हो जाएगा। मैं अस्पताल पहुंची। वहां बेटी को देखकर दंग रह गई। उसे देखकर यही लगा कि कोई जानवर भी ऐसा नहीं करता। मेरी बेटी के बाल खींचे गए थे। गर्दन के पास उसके सिर की चमड़ी उखड़ गई थी। मैं बेटी की वह सूरत कभी नहीं भूल सकती हूं।

सवाल- चारों दोषियों के परिवारवालों के लिए भी कोई संदेश देना चाहती हैं?
जवाब- नहीं। मैं उनके बारे में कोई बात नहीं करना चाहती हूं। 

सवाल- आपने 7 साल तक लड़ाई लड़ी। महीने में आपको कितनी बार कोर्ट जाना पड़ता था?
जवाब- मैंने कभी लिखकर नहीं रखा कि मैं कितनी बार कोर्ट गई। कितनी बार कहां गई? लेकिन कोर्ट में कई छुट्टियां हुईं। लेकिन मैंने कभी भी, किसी भी दिन कोर्ट की सुनवाई को मिस नहीं किया। 

सवाल- आज आपकी बेटी को इंसाफ मिल गया। अब आप आगे क्या करेंगी? 
जवाबा- सबसे जरूरी है कि हम इसपर काम करेंगे कि हमारे केस में जो भी कमी रही। जो भी कानून के लूप होल्स रहे। जो भी हमारे कानून में कमियां रही हैं। सब लोग मिलकर इसपर काम करेंगे। जो भी हमारी बच्चियां हैं, उन्हें समय से इंसाफ मिले। समाज में संदेश जाए। हमारी बच्चियों को इंसाफ मिल सके।

सवाल- 7 साल की लंबी लड़ाई में आपकी सबसे ज्यादा मदद किन लोगों ने की?
जवाब- इस लड़ाई में सबका अपना-अपना रोल रहा, जो बहुत अहम था। लेकिन फाइनली जो हमारी वकील हैं सीमा कुशवाहा, उनका बहुत योगदान रहा। मैं तो उनके पीछे थी। संघर्ष वो कर रहे थे। सीमा कुशवाहा जब वकील नहीं थी, तब से हमसे जुड़ी हुई हैं। करीब साल 2013 से ही। उन्होंने एक वकील की ड्यूटी के साथ ही एक बेटी का भी फर्ज निभाया। हमें हमेशा हिम्मत रखने के लिए साहस दिया। वह बार-बार कहती थीं कि आंटी आप हिम्मत मत हारो। हमें इंसाफ मिलेगा। फाइनली उस बेटी ने आज केस को उस मुकाम पर पहुंचा दिया।