आध्यात्मिक साधना करने पर आप फल की उम्मीद करते हैं, लेकिन ये फल इस जीवन में नहीं मिलता। ये पेड़ की ऊपरी परत को नहीं छूता, बल्कि भीतर तक समा जाता है। आध्यात्मिक साधना का यही अर्थ है। ऊपरी तौर पर...

आध्यात्मिक गुरु और योगी सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने सनातन धर्म के 'कर्म सिद्धांत' के बारे में बताया है। ये वीडियो अब खूब वायरल हो रहा है। कर्म को चार भागों में बांटा गया है। एक प्रारब्ध कर्म। दूसरा संचित कर्म। संचित मतलब हाथ का बैग। प्रारब्ध एक जीवन के लिए होता है। ये प्रारब्ध कर्म आपके जीवनकाल को निर्धारित करता है। अगर आज आपका प्रारब्ध कर्म खत्म हो जाए, तो आप मर सकते हैं। आप स्वस्थ हो सकते हैं, फिर भी मर जाएंगे। क्योंकि सॉफ्टवेयर चला गया है।

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शरीर में वो नहीं है, उस जीवन के लिए जरूरी सॉफ्टवेयर। कुछ देर सुंदर स्थिति, फिर आप निश्चल हो जाते हैं, फिर चले जाते हैं। इसलिए हम प्रारब्ध कर्म को नहीं छूते। छूते हैं संचित को। कर्म का एक भंडार है। इस जीवन में वो प्रकट नहीं होता, आता ही नहीं। वो इस जीवन के बारे में नहीं है। लेकिन, सत्व उससे ही भरा होता है।

इसलिए अगर हम संचित कर्म को पिघलाते हैं, तो ये बहुत बड़ा भंडार है। साधारण भंडार नहीं, जटिल भंडार। अगर ये पिघलना शुरू हो जाए, तो आपको लगेगा कि आपके जीवन में कुछ नहीं बदला। लेकिन एक तरह की पारदर्शिता आ जाती है। आपके अस्तित्व के अपारदर्शी तत्व कम हो जाते हैं। लेकिन, दिखाई देने वाला कोई परिवर्तन नहीं होता, आप अभी भी वैसे ही हैं, वही व्यक्ति। आपको खुद आश्चर्य होगा, ये क्या है? आध्यात्मिक प्रक्रिया?

जब भी आप आध्यात्मिक साधना करते हैं, तो आप फल की उम्मीद करते हैं। लेकिन ये फल इस जीवन में नहीं मिलता, इसे अभी उम्मीद मत करो। ये पेड़ की ऊपरी परत को नहीं छूता, बल्कि भीतर के सार को निगल जाता है। आध्यात्मिक साधना यही है।

ऊपरी तौर पर आप वही व्यक्ति रहेंगे, लेकिन भीतर के तत्व, यानी संचित कर्म पिघलते रहेंगे।' आध्यात्मिक गुरु, योगी सद्गुरु जग्गी वासुदेव ने अपने एक प्रवचन में ये रहस्य बताया है।