Central Motor Vehicles amended Rule : सड़कों पर बच्चों की सुरक्षा के लिए नए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने नई गाइडलाइन जारी की है। मंगलवार 15 फरवरी 2022 को इस संबंध में अधिसूचना जारी की गई। इसके तहत चार साल से कम उम्र के बच्चों को बाइक पर ले जाने के नियमों में संशोधन किया गया है। 

नई दिल्ली। सड़कों पर बच्चों की सुरक्षा के लिए नए सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने नई गाइडलाइन जारी की है। मंगलवार 15 फरवरी 2022 को इस संबंध में अधिसूचना जारी की गई। इसके तहत चार साल से कम उम्र के बच्चों को बाइक पर ले जाने के नियमों में संशोधन किया गया है। नए नियम में कहा गया कि चार साल से कम उम्र के बच्चों के लिए, मोटर साइकिल पर बैठकर जाने या मोटर साइकिल पर किसी के द्वारा ले जाने के संबंध में सुरक्षा उपायों का प्रावधान कर सकते हैं। इस अधिनियम के तहत बच्चों को मोटरसाइकिल पर सुरक्षा बेल्ट और सुरक्षा हेलमेट के उपयोग का निर्देश देता हे। ये नियम एक अक्टूबर 2022 से प्रभावी होंगे। 

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नए नियमों में क्या 

चार साल से कम उम्र के बच्चों को मोटरसाइकिल पर ले जाने के लिए चालक से जोड़ने के लिए सेफ्टी हार्नेस का उपयोग किया जाएगा। यह बच्चे को पहनाया जाएगा, जिससे बच्चे की कमर में बंधी पटि्टयां चालक द्वारा पहने गए शोल्डर लूप्स से जुड़ी होंगी। इससे बच्चे का ऊपर का शरीर चालक के साथ जुड़ा होगा। इसे 30 किलो तक भार वहन करने के लिए डिजाइन किया गया है।

9 महीने से लेकर 4 साल तक की उम्र के बच्चे को क्रैश हेलमेट पहनाना होगा, जो उसके सिर पर फिट बैठता हो। यदि यह हेलमेट नहीं है तो साइकिल पर इस्तेमाल होने वाला हेलमेट पहनना होगा। यह हेलमेट भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम 2016 के अधीन होना चाहिए। 

चार साल तक का बच्चा यदि मोटरसाइकिल पर है तो वाहन की स्पीड 40 किमी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इससे ज्यादा स्पीड होने पर कार्रवाई की जा सकेगी। 

30 प्रतिशत बच्चे होते हैं दुर्घटनाओं का शिकार 
सेफ लाइफ फाउंडेशन और Mercedes-Benz रिसर्च एंड डेवलपमेंट इंडिया के 2021 में किए गए एक सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक देश में 47 फीसदी छोटे बच्चे टू-व्हीलर पर या स्कूल की गाड़ियों में स्कूल जाते हैं। बच्चे अभिभावकों के साथ टू-व्हीलर पर हेलमेट भी नहीं लगाते। ऐसे में वे हादसे का शिकार होते हैं। यह सर्वे भोपाल, दिल्ली, चेन्नई और जयपुर जैसे 14 शहरों के बीच किया गया। करीब 12 हजार लोगों के बीच हुए इस सर्वे में सामने आया था कि ऐसे करीब 30 फीसदी बच्चे दुर्घटना का शिकार होते हैं। 

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