दक्षिण गुजरात में 'रिज-टू-वैली' मॉडल से जल संरक्षण को बढ़ावा मिला है। पिछले 5 सालों में 170 चेक डैम और 215 तालाबों से करीब 580 करोड़ लीटर भूजल रिचार्ज हुआ है, जिससे स्थानीय लोगों को रोजगार और किसानों को सिंचाई के लिए पानी मिला है।
सूरत (गुजरात) [भारत], 30 जून (एएनआई): दक्षिण गुजरात के जंगल वन विभाग के 'रिज-टू-वैली' मॉडल के तहत प्राकृतिक जल भंडार में तब्दील हो रहे हैं। यह 'जल शक्ति अभियान: कैच द रेन' अभियान का हिस्सा है, जिससे जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज और ग्रामीण आजीविका को मजबूती मिल रही है। सूरत जिले के उमरपाड़ा जैसे वन क्षेत्रों में चेक डैम, वन तालाब और कंटूर खाइयों के माध्यम से बारिश के पानी को सहेजा जा रहा है। पिछले पांच वर्षों में इस पहल के तहत लगभग 170 चेक डैम और 215 वन तालाबों का निर्माण हुआ है, जिससे करीब 580 करोड़ लीटर भूजल को रिचार्ज करने में मदद मिली है।

किसानों को मिल रहा दोहरा लाभ
किसानों का कहना है कि जल संरक्षण संरचनाओं से खेती और स्थानीय रोजगार दोनों को फायदा हुआ है। धीरतन गांव के किसान जेठिया भाई वसावा ने कहा, "पानी जमा करने के लिए एक चेक डैम और एक तालाब बनाया गया है। खुदाई के काम से ग्रामीणों को रोजगार मिलता है और जमा हुए पानी से किसानों को अपने खेतों की सिंचाई करने में मदद मिलती है।"
घनवाद गांव के एक अन्य किसान राकेश कुमार वसावा ने कहा कि चेक डैम और तालाबों से वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज में सुधार हुआ है। उन्होंने कहा, "भूजल स्तर बढ़ा है, बोरवेल में सुधार हुआ है और इस पहल से वन क्षेत्रों में रहने वाले किसानों को बहुत फायदा हुआ है।"
भूजल स्तर में सुधार, रोजगार के अवसर बढ़े
अधिकारियों ने बताया कि इस परियोजना से पूरे क्षेत्र में पानी की उपलब्धता में काफी वृद्धि हुई है। उप वन संरक्षक धीरज कुमार ने कहा कि इस पहल के तहत 150 से अधिक चेक डैम, 200 से अधिक वन तालाब और लगभग दो लाख रनिंग मीटर कंटूर खाइयां बनाई गई हैं। उन्होंने कहा, "इन संरचनाओं से वर्षा जल संचयन और भूजल रिचार्ज में सुधार हुआ है। सूरत वन प्रभाग के तहत उमरपाड़ा, मांडवी और वाकल सहित आदिवासी क्षेत्रों में भूजल स्तर बढ़ा है और कुओं और बोरवेल में पानी की उपलब्धता में सुधार हुआ है।"
सहायक वन संरक्षक गौरव लोढ़ा ने बताया कि सूरत वन प्रभाग ने पिछले पांच वर्षों में लगभग 580 करोड़ लीटर पानी का संरक्षण किया है। उन्होंने कहा, "जिन क्षेत्रों में मृदा और नमी संरक्षण (Soil and Moisture Conservation) का काम किया गया है, वहां भूजल स्तर में लगभग एक से डेढ़ मीटर की वृद्धि हुई है। अकेले पिछले साल के दौरान, लगभग 1.15 लाख मानव-दिवस का रोजगार पैदा हुआ, जिससे स्थानीय समुदायों, खासकर आदिवासी क्षेत्रों में आजीविका के अवसर मिले, पलायन कम हुआ और सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।"
एकीकृत वाटरशेड मैनेजमेंट का बेहतरीन उदाहरण
अधिकारियों ने कहा कि 'रिज-टू-वैली' मॉडल वर्षा जल संरक्षण, भूजल रिचार्ज, रोजगार सृजन और पर्यावरण संरक्षण को मिलाकर एकीकृत वाटरशेड मैनेजमेंट का एक उदाहरण बनकर उभरा है, जो दक्षिण गुजरात में दीर्घकालिक जल सुरक्षा में योगदान दे रहा है। (एएनआई)
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