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फैसले की घड़ीः उन्नाव की बेटी को मिला न्याय, रेप के दोषी विधायक सेंगर को उम्रकैद की सजा

उन्नाव रेप मामले में दोषी ठहराए गए विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा पर सुनवाई पूरी हो गई। दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट ने इस मामले की सुनवाई करते हुए विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई गई है। साथ ही 25 लाख रुपए जुर्माना लगाया गया है। 

Unnao's daughter will get justice, rape convict MLA Sengar can be punished kps
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Delhi, First Published Dec 20, 2019, 1:05 PM IST
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नई दिल्ली. उत्तर प्रदेश के चर्चित उन्नाव रेप मामले में दोषी ठहराए गए विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की सजा पर सुनवाई पूरी हो गई। जिसमें कोर्ट ने विधायक सेंगर को उम्रकैद की सजा सुनाई है। साथ ही 25 लाख रुपए जुर्माना भी लगाया गया है। इससे पहले 17 दिसंबर को इस मामले की हुई सुनवाई में सीबीआई ने सेंगर को अधिकतम सजा देने की मांग उठाई थी। साथ ही पीड़िता को उचित मुआवजा दिए जाने का आग्रह किया था। 

बचाव में दी गई थी यह दलील 

बचाव पक्ष द्वारा कोर्ट में सुनवाई के दौरान वकील ने कहा कि कुलदीप सेंगर 54 साल के हैं और उनका पूरा करियर देखा जाए तो वर्ष 1988 से अभी तक वो पब्लिक डीलिंग करते रहे हैं। उन्होंने हमेशा लोगों की सेवा की है। साथ ही वकील ने कहा था कि उनके खिलाफ यह पहला मामला है। उनकी दो बेटियां हैं जो शादी के लायक हैं ऐसे में उनको कम से कम सजा दी जानी चाहिए। 

तीन और मामले हैं सेंगर पर 

बता दें कि कुलदीप सेंगर पर अभी तीन और मामले दिल्ली की विशेष सीबीआई कोर्ट में चल रहे हैं। अभी सेंगर को रेप के मामले में दोषी करार दिया गया है। वर्ष 2017 में मामला सामने आने के बाद कुलदीप सेंगर को 14 अप्रैल, 2018 को गिरफ्तार किया गया था। जिसके बाद बीजेपी ने उन्हें पार्टी से निष्काषित कर दिया था। 

कोर्ट ने कहा, पीड़िता नाबालिग थी 

बीते सोमवार को कोर्ट ने अपना फैसला सुनाते हुए विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को दोषी ठहराया था। कोर्ट ने कहा था कि जब ये मामला सामने आया था तो पीड़िता नाबालिग थी। वारदात के बाद वो डरी हुई थी और उसे लगातार धमकियां मिल रही थीं। उसके परिवार को जान का खतरा था। कोर्ट ने कहा कि वो एक पावरफुल पर्सन से लड़ रही थी और इसी के चलते पीड़ित परिवार पर फर्जी केस भी लगाए गए। दूसरी ओर अदालत ने मामले में आरोपी बनाई गई शशि सिंह की भूमिका को संदेह के घेरे में रखा। शशि ‌सिंह के खिलाफ पर्याप्त सबूत न होने और उनकी इसमें सीधे तौर पर भूमिका स्पष्ट नहीं होने के चलते कोर्ट ने उन्हें संदेह का लाभ देते हुए मामले से बरी कर दिया था। 

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