Abraham Accord Explained: अब्राहम समझौता क्या है और इसे मिडिल ईस्ट की राजनीति में इतना अहम क्यों माना जाता है? अमेरिका सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान को Abraham Accord में शामिल करने की कोशिश क्यों कर रहा है? पाकिस्तान और सऊदी अरब के लिए इजराइल से रिश्ते सामान्य करना राजनीतिक और धार्मिक चुनौती क्यों माना जा रहा है?
Abraham Accord: मिडिल ईस्ट की राजनीति एक बार फिर बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। ईरान परमाणु समझौते को लेकर जारी वैश्विक जद्दोजहद के बीच अब अमेरिका ने एक नया कूटनीतिक दांव चला है। वॉशिंगटन ने आधिकारिक तौर पर सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे मुस्लिम देशों से अब्राहम समझौते में शामिल होने की अपील की है। यह वही समझौता है जिसने कुछ साल पहले इजराइल और अरब देशों के रिश्तों की दिशा बदल दी थी। अमेरिका के इस कदम को सिर्फ एक कूटनीतिक पहल नहीं, बल्कि मिडिल ईस्ट में बदलते शक्ति संतुलन की बड़ी रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। खास बात यह है कि यह दबाव ऐसे समय में बढ़ा है जब ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु समझौते को लेकर बातचीत फिर चर्चा में है।

क्या है अब्राहम समझौता?
अब्राहम समझौता 2020 में अमेरिका की पहल पर शुरू किया गया एक ऐतिहासिक कूटनीतिक समझौता था। इसका नाम नबी इब्राहीम पर रखा गया, जिन्हें इस्लाम, यहूदी और ईसाई, तीनों धर्मों में सम्मानित पूर्वज माना जाता है। इस समझौते का मुख्य उद्देश्य इजराइल और अरब देशों के बीच संबंधों को सामान्य बनाना था। सबसे पहले संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने इस समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके बाद बहरीन, सूडान और मोरक्को भी इसमें शामिल हुए। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति Donald Trump ने अपने पहले कार्यकाल में इसे अपनी सबसे बड़ी विदेश नीति उपलब्धियों में शामिल बताया था। इसे इजराइल को अरब दुनिया में कूटनीतिक मान्यता दिलाने वाला बड़ा कदम माना गया।
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अब अमेरिका क्यों बढ़ा रहा दबाव?
अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक रिपब्लिकन सीनेटर Lindsey Graham ने कहा है कि मिडिल ईस्ट में स्थिरता और सामान्य स्थिति बनाने के लिए सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों का इस समझौते में शामिल होना जरूरी है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इसके पीछे कई रणनीतिक कारण हैं।
1. चीन और रूस के प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश
अमेरिका लंबे समय से मिडिल ईस्ट में अपनी रणनीतिक पकड़ मजबूत बनाए रखना चाहता है। इसके लिए वह MESA यानी Middle East Strategic Alliance जैसी रणनीतियों पर काम कर रहा है।
वॉशिंगटन चाहता है कि इजराइल, सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान जैसे देशों के बीच सामरिक और आर्थिक सहयोग बढ़े, ताकि भविष्य में चीन और रूस का प्रभाव सीमित किया जा सके।
इजराइल की स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश
गाजा और फिलिस्तीन से जुड़े संघर्षों के कारण मुस्लिम देशों में इजराइल को लेकर नाराजगी बनी हुई है। ऐसे में अमेरिका चाहता है कि बड़े मुस्लिम देश अगर अब्राहम समझौते का हिस्सा बनते हैं तो इजराइल की क्षेत्रीय स्वीकार्यता बढ़ेगी। यदि सऊदी अरब और पाकिस्तान जैसे प्रभावशाली मुस्लिम देश इसमें शामिल होते हैं, तो इजराइल के साथ उनके व्यापार, रक्षा और तकनीकी संबंध भी मजबूत हो सकते हैं।
पाकिस्तान क्यों है अमेरिका के लिए अहम?
पाकिस्तान दुनिया का पहला परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश है। अमेरिका की रणनीति में उसकी भूमिका हमेशा अहम रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान और अफगानिस्तान में तालिबान जैसे मुद्दों को संतुलित करने के लिए अमेरिका पाकिस्तान को अपने करीब रखना चाहता है। यही वजह है कि अब्राहम समझौते में पाकिस्तान की संभावित भागीदारी को लेकर चर्चा तेज हुई है। हालांकि पाकिस्तान के भीतर इस मुद्दे को लेकर स्थिति बेहद संवेदनशील है।
पाकिस्तान और सऊदी अरब के सामने धर्मसंकट
अटलांटिक काउंसिल के दक्षिण एशिया विशेषज्ञ माइकल कुघलमैन के अनुसार पाकिस्तान के लिए इस समझौते में शामिल होना आसान नहीं होगा। पाकिस्तान की जनता लंबे समय से फिलिस्तीन के समर्थन में खड़ी रही है और वहां इजराइल के साथ रिश्ते सामान्य करने को लेकर तीखा विरोध हो सकता है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ पहले ही संकेत दे चुके हैं कि इस समझौते में शामिल होने का फिलहाल कोई इरादा नहीं है। हालांकि पाकिस्तान की विदेश और सुरक्षा नीति में अंतिम निर्णय अक्सर सेना और शीर्ष नेतृत्व के स्तर पर तय होता है। सऊदी अरब की स्थिति भी कुछ ऐसी ही मानी जा रही है। एक तरफ वह अमेरिका का करीबी सहयोगी है, तो दूसरी तरफ उसे मुस्लिम दुनिया की भावनाओं और फिलिस्तीन मुद्दे को भी संतुलित रखना पड़ता है।
ट्रंप की राजनीति और यहूदी समुदाय का समीकरण
विश्लेषकों का मानना है कि अब्राहम समझौते को फिर से चर्चा में लाकर Donald Trump अपने पारंपरिक इजराइल समर्थक वोट बैंक और यहूदी समुदाय को मजबूत संदेश देना चाहते हैं। क्विंसी इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ त्रिता पारसी के मुताबिक अमेरिका और ईरान के बीच कुछ मुद्दों पर नरमी की खबरों को इजराइल समर्थक तबका पसंद नहीं कर रहा। ऐसे में ट्रंप अब्राहम समझौते को आगे बढ़ाकर यह दिखाना चाहते हैं कि उनकी नीति अब भी इजराइल समर्थक है।
मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़ा मोड़?
आने वाले महीनों में यह साफ होगा कि सऊदी अरब, कतर और पाकिस्तान अमेरिका के इस प्रस्ताव पर क्या रुख अपनाते हैं। लेकिन इतना तय है कि अब्राहम समझौते को लेकर बढ़ती सक्रियता मिडिल ईस्ट की राजनीति में एक नए समीकरण की ओर इशारा कर रही है। अगर ये देश इसमें शामिल होते हैं तो इसका असर सिर्फ इजराइल और अरब देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी वैश्विक कूटनीति, ऊर्जा राजनीति और मुस्लिम दुनिया की आंतरिक रणनीतियों पर भी पड़ सकता है।
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