यूपी कांग्रेस में नेतृत्व परिवर्तन के बाद अजय राय को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हैं। धार्मिक गतिविधियों, संगठन की मजबूती और अखिलेश यादव से रिश्तों पर सवाल उठ रहे हैं। क्या राहुल गांधी से मुलाकात के बाद तस्वीर साफ होगी?

उत्तर प्रदेश कांग्रेस में प्रदेश अध्यक्ष बदलने के बाद सियासी हलचल थमने का नाम नहीं ले रही है। आराधना मिश्रा के पदभार ग्रहण समारोह में हुए विवाद के बाद पूर्व अध्यक्ष अजय राय की चुप्पी ने अटकलों को और हवा दे दी है। सवाल सिर्फ कुर्सी जाने का नहीं, बल्कि उन राजनीतिक समीकरणों का भी है, जिन्होंने पार्टी के भीतर मतभेदों की चर्चा तेज कर दी है।

अजय राय से नाराजगी की 3 वजहें, समर्थकों ने क्या दावा किया?

अजय राय के करीबियों के मुताबिक, उनके धार्मिक कार्यक्रमों में सक्रिय रहने को लेकर कांग्रेस के कुछ नेताओं में असहजता थी। समर्थकों का दावा है कि अयोध्या में रामलला के दर्शन और मथुरा में बांके बिहारी मंदिर जाने को पार्टी की राजनीतिक रणनीति से जोड़कर देखा गया।

दूसरा दावा पश्चिमी यूपी में अल्पसंख्यक समुदाय से जुड़े मुद्दों पर उनकी सक्रियता को लेकर है। समर्थकों का कहना है कि सहारनपुर समेत कई इलाकों में उनकी मुखरता से पार्टी के कुछ नेताओं के साथ मतभेद बढ़े। तीसरी वजह उनकी बेबाक कार्यशैली बताई जा रही है। हालांकि, ये समर्थकों के दावे हैं, जिनकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।

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विरोधियों ने संगठन और अखिलेश यादव से रिश्तों पर उठाए सवाल

अजय राय के आलोचकों का आरोप है कि करीब तीन साल प्रदेश अध्यक्ष रहने के बावजूद कांग्रेस बूथ स्तर पर मजबूत संगठन खड़ा नहीं कर सकी। बीजेपी में जा चुके पूर्व कांग्रेस नेता राजेश मिश्रा ने भी संगठन की कमजोरी को लेकर सवाल उठाए हैं।

इसके अलावा, समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के साथ अजय राय की बयानबाजी को लेकर भी आलोचना हुई। विरोधियों का मानना है कि कांग्रेस-सपा गठबंधन में बेहतर तालमेल जरूरी था। गौरतलब है कि दोनों दलों ने 2024 के लोकसभा चुनाव में साथ मिलकर चुनाव लड़ा था।

कांग्रेस छोड़ेंगे अजय राय या राहुल गांधी से मिलेगी नई जिम्मेदारी?

अजय राय के करीबियों के मुताबिक, फिलहाल उनके कांग्रेस छोड़ने की कोई योजना नहीं है। समर्थकों ने बीजेपी में वापसी और सपा या बसपा में जाने की अटकलों को भी खारिज किया है। इस बीच, अजय राय के दिल्ली जाने और राहुल गांधी समेत वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की संभावना की चर्चा है। हालांकि, मुलाकात और उसके नतीजे की आधिकारिक पुष्टि के बिना किसी नए राजनीतिक फैसले का निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। अब देखना होगा कि कांग्रेस नेतृत्व के साथ उनकी बातचीत से प्रदेश की राजनीति में क्या नया मोड़ आता है।

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