Allahabad High Court Statement: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शादी का झांसा देकर रेप के आरोपी इंस्पेक्टर अमित कुमार के खिलाफ केस रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा, हर शादी के वादे पर बना संबंध रेप नहीं, शुरुआत से झूठे वादे का सबूत जरूरी है।

शादी का वादा... फिर शारीरिक संबंध और उसके बाद रेप का मुकदमा। ऐसे मामलों में कानून की एक अहम कसौटी यह है कि क्या शादी का वादा शुरुआत से ही झूठा था? इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक मामले में इसी सवाल पर फैसला सुनाते हुए पुलिस इंस्पेक्टर अमित कुमार के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि केवल शादी के वादे के साथ बने हर संबंध को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता।

2013 में हुई थी पहचान, 2020 में दर्ज हुआ मुकदमा

मथुरा के कोसीकलां की युवती ने 8 जनवरी 2020 को वाराणसी के महिला थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप था कि 2013 में कोसीकलां में तैनात रहे इंस्पेक्टर अमित कुमार ने शादी का प्रस्ताव दिया और अपनी पहली शादी की बात छिपाई। युवती ने 2019 में वाराणसी के एक होटल में नशीला पदार्थ देकर दुष्कर्म, अश्लील फोटो-वीडियो से ब्लैकमेल और जबरन गर्भपात कराने जैसे आरोप लगाए थे।

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कोर्ट ने किन बातों को माना अहम?

मामले की जांच के बाद पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की। इसके खिलाफ इंस्पेक्टर ने हाईकोर्ट का रुख किया। सुनवाई में कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद कई परिस्थितियों पर गौर किया। कोर्ट के अनुसार युवती बालिग और शिक्षित थी तथा आरोपी को कई वर्षों से जानती थी। वह अपने स्तर पर वाराणसी गई और बाद में भी आरोपी के संपर्क में रही। व्हाट्सऐप चैट में उसके द्वारा आरोपी के तलाक तक इंतजार करने की बात भी दर्ज थी।

ब्लैकमेल वाले आरोप पर भी कोर्ट की नजर

अदालत ने यह भी नोट किया कि कथित अश्लील फोटो-वीडियो जांच के दौरान बरामद नहीं हुए और न ही उन्हें अदालत के सामने पेश किया गया। कोर्ट के रिकॉर्ड के मुताबिक आरोपी ने शादी से पूरी तरह इनकार नहीं किया था। उसकी पहली पत्नी से 14 दिसंबर 2023 को तलाक हुआ था। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड से यह स्थापित नहीं होता कि शादी का वादा शुरुआत से ही झूठा था।

कोर्ट ने क्यों रद्द कर दी पूरी कार्यवाही?

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि शादी के वादे के आधार पर बने संबंध को दुष्कर्म मानने के लिए यह स्थापित होना जरूरी है कि वादा शुरुआत से ही झूठा था और उसी झूठे वादे के कारण महिला की सहमति प्राप्त की गई थी। अदालत ने कहा कि इस मामले में उपलब्ध सामग्री से आरोपी के खिलाफ आवश्यक आपराधिक दायित्व बनता नहीं दिख रहा है। इसलिए कार्यवाही जारी रखना न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा। इसी आधार पर कोर्ट ने चार्जशीट और उससे जुड़ी पूरी आपराधिक कार्यवाही रद्द कर दी।

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