बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों पर बढ़ती हिंसा ने कट्टरपंथ, ईशनिंदा आरोपों और भीड़ न्याय की प्रवृत्ति को उजागर किया है। राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर प्रशासन के बीच कई हत्याएं हुईं। विशेषज्ञ निवारक कार्रवाई और कानूनी प्रक्रिया की मांग कर रहे हैं।
Bangladesh Violence: दिसंबर 2025 में पूरे बांग्लादेश में हुई हिंदुओं की हत्याएं कोई अलग-थलग अपराध नहीं, बल्कि हिंदू माइनॉरिटी पर लंबे समय से चल रहे जुल्म का सबसे नया उदाहरण हैं। एक महीने से भी कम समय में, कम से कम 12 हिंदुओं की हत्या कर दी गई, जिनमें से कई भीड़ की हिंसा और एक्स्ट्रा ज्यूडिशियल सजा के जरिए मारे गए। यह दिखाता है कि जब राजनीतिक अस्थिरता, धार्मिक कट्टरपंथ और इंस्टिट्यूशनल नाकामी एक साथ मिलते हैं तो नतीजा अल्पसंख्यकों पर हिंसा के रूप में सामने आता है।
बांग्लादेश में मारे गए लोगों में दीपू चंद्र दास, अमृत मंडल उर्फ सम्राट, दिलीप बोरमोन, प्रांतोश कोरमोकर, उत्पोल सरकार, जोगेश चंद्र रॉय, सुबोर्ना रॉय, शांतो दास, रिपन कुमार सरकार, प्रताप चंद्र, स्वाधीन चंद्र और पोलाश चंद्र शामिल हैं। हालांकि, अधिकारियों ने हर मौत को एक अलग क्रिमिनल घटना के तौर पर दिखाने की कोशिश की है, लेकिन कुल मिलाकर पैटर्न में इत्तेफाक के बजाय सिस्टमैटिक कमजोरी साफ नजर आती है।
कट्टरपंथ की गहरी जड़ें
बांग्लादेश में हिंदुओं पर बढ़ते हमले यह संकेत देते हैं कि धार्मिक कट्टरपंथ की जड़ें देश के सामाजिक और राजनीतिक ढांचे में गहरी होती गई हैं। लगातार भारत-विरोधी बयानबाज़ी और सांप्रदायिक भाषणों ने ऐसा माहौल बनाया है, जिसमें अल्पसंख्यक समुदाय असुरक्षित महसूस करता है। सार्वजनिक बहस में हिंदुओं के प्रति दुश्मनी को कट्टरता नहीं, बल्कि “विचारधारा का विरोध” बताकर पेश किया जा रहा है। इससे राजनीतिक लामबंदी और सांप्रदायिक धमकी के बीच की रेखा धुंधली हो रही है। बदलाव और छात्र आंदोलनों की भाषा का इस्तेमाल कई बार ऐसे एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए किया गया, जिससे कट्टरपंथी समूहों को खुलकर सक्रिय होने का मौका मिला। इसका सीधा असर देश के हिंदू अल्पसंख्यकों पर पड़ा है।
ईशनिंदा के आरोप और भीड़ हिंसा का पैटर्न
दिसंबर में हुई कई हत्याओं में ईशनिंदा (ब्लासफेमी) के आरोप लगाए गए। ऐसे आरोप अक्सर बिना ठोस सबूत, औपचारिक शिकायत या जांच के सामने आते हैं। फिर भी ये भीड़ को भड़काने और हिंसा को सही ठहराने का माध्यम बन जाते हैं। कुछ मामलों में पीड़ितों पर जबरन वसूली या आपराधिक गतिविधियों के आरोप भी लगाए गए, लेकिन ज्यादातर मामलों में कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ। गिरफ्तारी और जांच की जगह भीड़ ने “तुरंत न्याय” का रूप ले लिया, जो कानून व्यवस्था के लिए गंभीर चुनौती है।
मैमनसिंह और राजबाड़ी की घटनाएं
मैमनसिंह जिले में एक हिंदू कपड़ा मजदूर दीपू चंद्र दास की हत्या इसी तरह के माहौल में हुई। उन पर कार्यस्थल पर इस्लाम के बारे में कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने का आरोप लगाया गया। भीड़ ने उन पर हमला किया, उन्हें बांधा और आग लगा दी। बाद में जांच में ईशनिंदा का कोई ठोस सबूत नहीं मिला। यह दिखाता है कि बिना वेरिफिकेशन के आरोप कितनी जल्दी जानलेवा हिंसा में बदल सकते हैं। इसी तरह, राजबाड़ी जिले में अमृत मंडल को पीट-पीटकर मार डाला गया। अधिकारियों ने बाद में किसी सांप्रदायिक एंगल से इनकार करते हुए उनके कथित आपराधिक अतीत पर जोर दिया। फिर भी, गिरफ्तारी की जगह भीड़ के हाथों हुई मौत ने हिंदू समुदाय में यह धारणा मजबूत की कि अल्पसंख्यकों को अक्सर न्यायिक प्रक्रिया का समान संरक्षण नहीं मिलता।
राजनीतिक अस्थिरता और प्रशासनिक दबाव
ये घटनाएं ऐसे समय में हुईं, जब देश में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक अस्थिरता थी। इससे कई जिलों में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक क्षमता पर दबाव पड़ा। पिछले दौर की अशांति की तरह, इस बार भी हिंदू समुदाय अधिक संवेदनशील स्थिति में दिखाई दिया। उन्हें या तो संगठित हमलों का सामना करना पड़ा या राजनीतिक संरक्षण की कमी के चलते आसान टारगेट माना गया।
धार्मिक राजनीति और पहचान आधारित लामबंदी
हाल के कुछ सालों में कट्टरपंथी इस्लामी समूह और उनके सहयोगी संगठन, जिनमें छात्र संगठन भी शामिल हैं, चुनावी समर्थन जुटाने के लिए मजहबी राष्ट्रवाद पर जोर देते रहे हैं। जब ठोस शासन और विकास के मुद्दे कमजोर पड़ते हैं, तो पहचान आधारित राजनीति तेज हो जाती है। ऐसे माहौल में हिंदू समुदाय आसानी से पोलराइज्ड पॉलिटिक्स का निशाना बन जाता है।
बार-बार दोहराया जाने वाला पैटर्न
विश्लेषकों के अनुसार, बांग्लादेश में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा को एक दोहराए जाने वाले पैटर्न के रूप में देखा जा सकता है। राजनीतिक अस्थिरता, मजहबी लामबंदी और भारत-विरोधी बयानबाजी जब एक साथ आती हैं, तो अल्पसंख्यक समुदाय अधिक कमजोर हो जाता है। जब तक धार्मिक या आपराधिक आरोपों को कानूनी प्रक्रिया से नहीं निपटाया जाता और राजनीतिक लाभ से ऊपर उठकर अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं की जाती, तब तक हालात में स्थायी सुधार मुश्किल होगा।


