क्या दोबारा से होंगे बिहार विधानसभा चुनाव? सुप्रीम कोर्ट पहुंची प्रशांत किशोर की जन सुराज
Bihar Election Cancellation Plea: बिहार चुनाव को लेकर बड़ा विवाद सामने आया है। जन सुराज पार्टी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर चुनाव रद्द करने और दोबारा मतदान कराने की मांग की है। महिलाओं को ₹10,000 ट्रांसफर को आचार संहिता उल्लंघन बताया गया है।

बिहार चुनाव पर सुप्रीम कोर्ट की दहलीज तक पहुंचा विवाद, जन सुराज पार्टी ने मांगा नए सिरे से मतदान
बिहार की राजनीति में एक बार फिर बड़ा संवैधानिक सवाल खड़ा हो गया है। चुनावी प्रक्रिया की हुकउप पर उठते सवालों के बीच प्रशांत किशोर द्वारा स्थापित जन सुराज पार्टी ने बिहार विधानसभा चुनाव 2025 को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है। पार्टी ने आरोप लगाया है कि आचार संहिता लागू रहने के दौरान की गई कुछ सरकारी गतिविधियों ने चुनाव की निष्पक्षता को गंभीर रूप से प्रभावित किया, जिसके चलते पूरे चुनाव को रद्द कर नए सिरे से मतदान कराया जाना चाहिए।
जन सुराज पार्टी की ओर से दायर रिट याचिका पर शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की पीठ सुनवाई करेगी, जिसमें मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जयमॉल्या बागची शामिल हैं। याचिका में दावा किया गया है कि चुनाव प्रक्रिया के दौरान संविधान और चुनाव कानूनों का खुला उल्लंघन हुआ है।
आचार संहिता में ₹10,000 ट्रांसफर पर सवाल
याचिका के अनुसार, आचार संहिता लागू रहने के बावजूद राज्य सरकार द्वारा महिलाओं को सीधे ₹10,000 की राशि हस्तांतरित की गई। जन सुराज पार्टी ने इसे जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के तहत “भ्रष्ट आचरण” बताया है। पार्टी का कहना है कि इस कदम से 25 से 35 लाख महिला मतदाताओं पर सीधा प्रभाव पड़ा, जिससे चुनावी संतुलन बिगड़ गया।
महिला रोजगार योजना और नए लाभार्थी
याचिका में मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना का भी विशेष उल्लेख किया गया है। आरोप है कि चुनाव अवधि के दौरान नए लाभार्थियों को जोड़ा गया और उन्हें भुगतान किया गया, जो न केवल आचार संहिता बल्कि संविधान के अनुच्छेद 14, 21, 112, 202 और 324 का उल्लंघन है। पार्टी का तर्क है कि ऐसी योजनाएं चुनाव के दौरान लागू करना निष्पक्ष और स्वतंत्र मतदान की भावना के खिलाफ है।
मतदान केंद्रों पर तैनाती पर भी आपत्ति
जन सुराज पार्टी ने यह भी आरोप लगाया है कि दोनों चरणों के मतदान के दौरान स्वयं सहायता समूह ‘जीविका’ से जुड़ी लगभग 1.8 लाख महिला लाभार्थियों की मतदान केंद्रों पर तैनाती की गई। याचिका में इसे अनुचित बताते हुए कहा गया है कि इससे मतदाताओं की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
चुनाव आयोग से दिशा-निर्देश की मांग
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि वह निर्वाचन आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत कार्रवाई के निर्देश दे। साथ ही, एस. सुब्रमण्यम बालाजी बनाम तमिलनाडु राज्य (2013) के फैसले का हवाला देते हुए मुफ्त योजनाओं, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और कल्याणकारी घोषणाओं पर स्पष्ट और सख्त दिशा-निर्देश तय करने की मांग की गई है। इसमें यह सुझाव भी दिया गया है कि चुनाव कार्यक्रम घोषित होने से कम से कम छह महीने पहले तक ऐसी योजनाओं के क्रियान्वयन पर रोक की न्यूनतम समयसीमा तय हो।
यह मामला केवल बिहार तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला भविष्य में चुनावों के दौरान सरकारी योजनाओं और प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण की सीमा तय कर सकता है। ऐसे में यह सुनवाई भारतीय चुनावी लोकतंत्र के लिए दूरगामी प्रभाव डालने वाली मानी जा रही है।
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