Ashok Dham Mandir Story: बिहार के लखीसराय अशोक धाम मंदिर में सावन सोमवार को भगदड़ मचने से 7 लोगों की मौत हो गई। 49 साल पहले एक चरवाहे ने इस 8वीं सदी के शिवलिंग को खोजा था।

Ashok Dham Temple History: बिहार के लखीसराय का अशोक धाम मंदिर आज हादसे की वजह से सुर्खियों में है। 17 अगस्त को सावन के तीसरे सोमवार को भगदड़ मचने से 7 श्रद्धालुओं की मौत की खबर है, जबकि 12 से ज्यादा लोग घायल बताए जा रहे हैं। घायलों को लखीसराय सदर अस्पताल पहुंचाया गया। इस दुखद घटना ने हर किसी को झकझोर कर रख दिया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि जिस मंदिर में आज लाखों की भीड़ उमड़ती है, उसका इतिहास क्या है? आखिर इस विशाल शिव मंदिर का नाम किसी राजा-महाराजा या देवी-देवता के नाम पर नहीं, बल्कि 'अशोक' नाम के एक साधारण लड़के पर क्यों रखा गया? आइए जानते हैं 'बिहार के देवघर' के नाम से मशहूर इस मंदिर की वो अनोखी और रहस्यमयी कहानी...

लखीसराय के अशोक धाम में क्या हुआ?

सावन के तीसरे सोमवार पर अशोक धाम मंदिर में सुबह से ही भक्तों की भारी भीड़ जुटी थी। बड़ी संख्या में लोग भगवान शिव को जल चढ़ाने और दर्शन करने पहुंचे थे। इसी दौरान मंदिर जाने वाले रास्ते पर अचानक भगदड़ मच गई। शुरुआती जानकारी के मुताबिक, बिजली के पोल से जुड़ी घटना के बाद लोगों के बीच अफरा-तफरी फैल गई और भीड़ का दबाव बढ़ गया। इसके बाद बैरिकेडिंग टूटने की बात सामने आई। कई लोग एक-दूसरे के ऊपर गिर गए। इस हादसे में 7 श्रद्धालुओं की मौत हो गई, जबकि 12 से ज्यादा लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई है।

'बिहार का देवघर' क्यों कहलाता है अशोक धाम?

लखीसराय का अशोक धाम बिहार के प्रमुख शिव मंदिरों में गिना जाता है। सावन के महीने में यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। महाशिवरात्रि और सावन के सोमवार को मंदिर में खास भीड़ देखने को मिलती है। इसी वजह से इसे कई लोग 'बिहार का देवघर' भी कहते हैं। मंदिर से जुड़ी मान्यताओं के मुताबिक, यहां मौजूद शिवलिंग का इतिहास काफी पुराना है और इसकी कहानी कई सदियों पीछे तक जाती है।

8वीं शताब्दी से जुड़ी है शिवलिंग की कहानी, 12वीं शताब्दी में बना मंदिर

अशोक धाम में मौजूद शिवलिंग को लेकर एक पुरानी मान्यता है कि इसकी पूजा 8वीं शताब्दी से होती आ रही है। बताया जाता है कि पाल वंश के छठे सम्राट नारायण पाल के समय इस शिवलिंग की नियमित पूजा शुरू कराई गई थी। अशोक धाम के इतिहास में 12वीं शताब्दी का भी जिक्र मिलता है। मान्यता के अनुसार, राजा इंद्रद्युम्न ने यहां एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। कहा जाता है कि लखीसराय की लाल पहाड़ी पर मौजूद उनके राजमहल से मंदिर तक एक गुप्त सुरंग भी बनाई गई थी। स्थानीय इतिहास और मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि मुगल काल के दौरान मंदिर को नुकसान पहुंचा और यह स्थान धीरे-धीरे लोगों की नजरों से दूर हो गया। इसके बाद कई सालों तक यहां मौजूद शिवलिंग के बारे में लोगों को जानकारी नहीं थी।

अशोक नाम के चरवाहे के नाम पर मंदिर का नाम

करीब 49 साल पहले 7 अप्रैल 1977 को लखीसराय का ही रहने वाला अशोक नाम का एक चरवाहा लड़का रोज की तरह यहां अपनी गायें चरा रहा था। इस दौरान वो दोस्तों के साथ गिल्ली-डंडा खेलने लगा। खेल-खेल में उसकी गिल्ली एक घनी झाड़ी में जा गिरी। अशोक जब गिल्ली ढूंढ़ने झाड़ियों में गया और वहां की मिट्टी हटाई, तो उसे जमीन के अंदर एक बहुत बड़ा शिवलिंग दिखाई दिया। उसने यह बात गांव वालों को बताई। चूंकि, भगवान शिव के इस विशाल रूप को एक साधारण से चरवाहे 'अशोक' ने खोजा था, इसलिए लोगों ने प्यार और सम्मान से इस जगह का नाम ही 'अशोक धाम' रख दिया।

शंकराचार्य ने किया था नए मंदिर का उद्घाटन

शिवलिंग मिलने के बाद स्थानीय लोगों और संतों के सहयोग से यहां दोबारा एक भव्य मंदिर बनाने का फैसला लिया गया। सालों की मेहनत के बाद, 11 फरवरी 1993 को जगन्नाथपुरी के शंकराचार्य ने खुद इस नए मंदिर परिसर का उद्घाटन किया। आज के समय में अशोक धाम पूरे देश के शिव भक्तों के लिए आस्था का बहुत बड़ा केंद्र है। सावन के महीने और महाशिवरात्रि पर यहां पैर रखने तक की जगह नहीं होती। मुंडन और दूसरे शुभ कामों के लिए भी लोग दूर-दूर से यहां आते हैं।