UP विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस और सपा में गठबंधन की बातचीत जारी है। लक्ष्य 2024 लोकसभा की सफलता दोहराना है। अंतिम फैसला राहुल गांधी और अखिलेश यादव की बैठक के बाद होगा। दोनों दल अपना संगठन भी मजबूत कर रहे हैं।
नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं। इससे पहले, कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) ने एक बार फिर गठबंधन के लिए बातचीत शुरू कर दी है। दोनों पार्टियों की नजर 2024 के लोकसभा चुनाव में मिली कामयाबी पर है, जिसे वे विधानसभा चुनाव में भी दोहराना चाहती हैं। हालांकि, सपा के कुछ स्थानीय नेता इस बात को उठा रहे हैं कि राज्य में कांग्रेस का जमीनी संगठन उतना मजबूत नहीं है।

गठबंधन पर आखिरी फैसला कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा प्रमुख अखिलेश यादव के बीच होने वाली बातचीत के बाद ही होगा। 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और सपा गठबंधन ने यूपी की 80 में से 43 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह एक बड़ी कामयाबी थी। इससे पहले, 2017 के विधानसभा चुनाव में दोनों पार्टियां अलग-अलग लड़ी थीं और बीजेपी ने बड़ी जीत हासिल कर सरकार बनाई थी। उस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटों पर जीत मिली थी और उसका वोट शेयर महज 2.33% था। 2017 के बाद भी दोनों पार्टियों के बीच रिश्ते कुछ खास अच्छे नहीं रहे।
मध्य प्रदेश चुनाव में जब कांग्रेस ने सपा को सीट देने से इनकार कर दिया, तो दोनों के बीच दूरियां और बढ़ गई थीं। कांग्रेस नेताओं का कहना है कि गठबंधन पर फैसला पार्टी का आलाकमान करेगा। फिलहाल, पार्टी का पूरा ध्यान अपने संगठन को मजबूत करने पर है। कांग्रेस सभी 403 विधानसभा सीटों पर अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए हर जिले में संगठन को मजबूत करने में जुटी है। वहीं, समाजवादी पार्टी ने तो चुनावी मैदान में काम भी शुरू कर दिया है। पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव जिलों का दौरा कर रहे हैं। हर जिले में उम्मीदवारों के चयन से पहले जातीय समीकरणों को समझने के लिए सर्वे भी कराया जा रहा है।
इस बीच, कांग्रेस और सपा को इस बात की भी चिंता है कि अगर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM चुनाव लड़ती है, तो वोटों का बंटवारा हो सकता है। दोनों पार्टियों को डर है कि बीजेपी दलित और मुस्लिम वोटों को बांटने के लिए ओवैसी, मायावती और चंद्रशेखर आजाद की पार्टियों को परदे के पीछे से समर्थन दे सकती है। दूसरी तरफ, बीजेपी ने भी चुनाव की तैयारियां शुरू कर दी हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी कैबिनेट में कुछ बदलाव भी किए थे।
