बिहार के सीतामढ़ी के 6 वर्षीय सुधांशु कुमार का क्लबफुट और जन्मजात विकृति का इलाज नारायण सेवा संस्थान उदयपुर में सफल रहा। दो ऑपरेशन और विशेष उपकरणों के बाद वह पहली बार बिना सहारे चल पाया। यह कहानी निःशुल्क दिव्यांग उपचार, प्रेरक चिकित्सा सफलता और बच्चे के आत्मविश्वास की नई शुरुआत को दर्शाती है।
Bihar Disabled Child Recovery Story: बिहार के सीतामढ़ी जिले के कटैया गांव में 6 वर्षीय सुधांशु कुमार का जीवन जन्म से ही संघर्षों से घिरा था। उसके दोनों पैरों और हाथों के अंगूठों में जन्मजात विकृति थी, जिसे चिकित्सा भाषा में क्लबफुट कहा जाता है। जिस उम्र में बच्चे दौड़ते-खेलते हैं, उस उम्र में सुधांशु का बचपन दर्द और असहायता के साए में बीत रहा था। चलना-फिरना तो दूर, वह अपने हाथों से खिलौने भी नहीं पकड़ पाता था। उसकी आंखों में सपने थे, लेकिन शरीर उन सपनों का साथ नहीं दे पा रहा था।
खिड़की से दिखती दुनिया और टूटते सपने
गांव के बच्चे जब गलियों में दौड़ते-खेलते थे, सुधांशु उन्हें अपनी खिड़की से टुकुर-टुकुर देखता रहता। उसके भीतर हर दिन एक ही सवाल उठता—क्या वह कभी उनके जैसा चल पाएगा? उसकी आंखों में अक्सर दर्द और निराशा के आंसू भर जाते थे। पिता पंकज झा की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, लेकिन बेटे के इलाज के लिए उनकी चिंता और संघर्ष लगातार बढ़ता जा रहा था। कर्ज लेने की सोच भी थी, लेकिन इलाज का कोई स्पष्ट रास्ता नहीं दिख रहा था।
एक उम्मीद की किरण: सोशल मीडिया से मिला जीवनदान
इन्हीं निराश क्षणों के बीच एक दिन पिता को सोशल मीडिया के माध्यम से एक उम्मीद की किरण दिखाई दी-नारायण सेवा संस्थान में नि:शुल्क इलाज की जानकारी। यह खबर उनके लिए किसी चमत्कार से कम नहीं थी। बिना समय गंवाए वे सुधांशु को लेकर उदयपुर पहुंचे, जहां उसके जीवन की नई शुरुआत होने वाली थी।

ऑपरेशन थिएटर से उम्मीद की वापसी
सुधांशु का इलाज लंबे धैर्य और विशेषज्ञ देखरेख में शुरू हुआ। पांच महीनों में उसकी कई जांचें हुईं और दो बड़े ऑपरेशन किए गए। 4 अक्टूबर 2025 को सफल सर्जरी के बाद उसका इलाज आगे बढ़ा और 12 अक्टूबर को उसे अस्पताल से छुट्टी दे दी गई। डॉक्टरों की मेहनत और परिवार की प्रार्थनाओं ने परिणाम बदल दिया था।
पहला कदम: जब जिंदगी ने खुद चलना सिखा दिया
12 नवंबर 2025 का दिन सुधांशु के जीवन का सबसे बड़ा मोड़ बन गया। फॉलो-अप के दौरान उसे विशेष जूते और कैलिपर्स पहनाए गए। कुछ ही क्षणों बाद वह धीरे-धीरे खड़ा हुआ… डगमगाया… और फिर अपने पैरों पर चल पड़ा। यह उसका पहला स्वतंत्र कदम था-जिसने पूरे माहौल को भावनाओं से भर दिया।
नई जिंदगी की शुरुआत
आज सुधांशु केवल चल नहीं रहा, बल्कि हर कदम के साथ आत्मविश्वास की नई ऊंचाइयों की ओर बढ़ रहा है। उसकी मुस्कान अब डर से नहीं, उम्मीद से भरी है। उसके पिता कहते हैं कि यह संस्थान केवल इलाज नहीं करता, बल्कि जीवन को दोबारा खड़ा करता है।


