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ड्रोन+उग्रवाद=नया खतरा? पूर्वोत्तर भारत की अहम संपत्तियों पर मंडराता “लो-कॉस्ट हाई-इम्पैक्ट” हमले का साया!
म्यांमार में सस्ते ड्रोन तकनीक ने पूर्वोत्तर भारत की सुरक्षा के लिए नया खतरा पैदा कर दिया है। विद्रोही गुट अब सैन्य ठिकानों, तेल क्षेत्रों और बांधों को निशाना बनाने में सक्षम हैं, जिससे “लो-कॉस्ट हाई-इम्पैक्ट” युद्ध का जोखिम बढ़ रहा है।

Northeast India Drone Threat: भारत का पूर्वोत्तर इलाका इन दिनों एक नए तरह के खतरे का सामना कर रहा है और यह खतरा न तो पारंपरिक हथियारों से जुड़ा है, न ही किसी बड़ी सेना से। यह खतरा है सस्ते लेकिन बेहद सटीक ड्रोन का, जो अब उग्रवादी गुटों के हाथों में “मिनी एयरफोर्स” जैसा काम कर रहे हैं।
म्यांमार से कैसे बढ़ रहा है ड्रोन खतरा?
खुफिया सूत्रों के मुताबिक, पड़ोसी देश म्यांमार में ड्रोन टेक्नोलॉजी का तेजी से इस्तेमाल बढ़ रहा है। वहां के विद्रोही गुट अब इन ड्रोन का उपयोग निगरानी, हमला और हथियार गिराने के लिए कर रहे हैं। सबसे खतरनाक बात यह है कि यह तकनीक अब भारत के पूर्वोत्तर में सक्रिय उग्रवादी संगठनों तक भी पहुंच रही है। यानी कम लागत में “हवाई ताकत” हासिल करना अब आसान हो गया है।
क्या भारत की रणनीतिक संपत्तियां अब सुरक्षित नहीं रहीं?
सूत्रों का कहना है कि कई अहम जगहें अब सीधे खतरे में हैं, जैसे:
- असम राइफल्स और सेना की सीमा चौकियां
- तेज़पुर और चाबुआ के वायुसेना बेस
- ONGC के तेल क्षेत्र और रिफाइनरियां
- सुबनसिरी जैसे बड़े पनबिजली बांध
ड्रोन के जरिए इन ठिकानों पर छोटे-छोटे विस्फोटक गिराए जा सकते हैं या फिर संचार व्यवस्था को जाम किया जा सकता है। इससे बड़ा आर्थिक और सैन्य नुकसान हो सकता है।
क्या उग्रवादी बना रहे हैं “लो-कॉस्ट हाई-इम्पैक्ट” हमला मॉडल?
- आज के समय में उग्रवादी गुटों के पास महंगे फाइटर जेट नहीं हैं, लेकिन सस्ते ड्रोन ने उनकी ताकत कई गुना बढ़ा दी है।
- ये ड्रोन पहाड़ी और जंगल वाले इलाकों में आसानी से छिपकर उड़ सकते हैं।
- सुरक्षा बलों की नज़र से बचकर सटीक हमला कर सकते हैं।
- लगातार निगरानी करके रणनीति बना सकते हैं।
- यही वजह है कि अब “लो-कॉस्ट, हाई-इम्पैक्ट” युद्ध का खतरा तेजी से बढ़ रहा है।
मणिपुर की घटनाएं क्या संकेत दे रही हैं?
- मणिपुर में हाल की घटनाएं इस खतरे को और गंभीर बनाती हैं।
- 2024 में ड्रोन से बम गिराने की घटना सामने आई
- 2025 में उग्रवादी समूह ने ड्रोन हमले का दावा किया
ये घटनाएं दिखाती हैं कि ड्रोन का इस्तेमाल अब सिर्फ प्रयोग नहीं, बल्कि असली हमलों में हो रहा है।
क्या विदेशी तकनीक और ट्रेनिंग बढ़ा रही है खतरा?
जांच एजेंसियों के मुताबिक, कुछ विदेशी नागरिकों की गिरफ्तारी से यह संकेत मिला है कि:
- उग्रवादियों को विदेशी तकनीक और ट्रेनिंग मिल रही है
- यूरोपीय हार्डवेयर और पश्चिमी विशेषज्ञता का इस्तेमाल हो सकता है
- यह पूरा नेटवर्क “प्रॉक्सी अस्थिरता” (proxy destabilisation) की रणनीति का हिस्सा हो सकता है
आखिर सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि:
- ड्रोन छोटे, सस्ते और आसानी से उपलब्ध हैं
- इन्हें पकड़ना और ट्रैक करना मुश्किल है
- कई ड्रोन एंटी-जैमिंग तकनीक के साथ आते हैं
- यानी पारंपरिक सुरक्षा सिस्टम अब इस नए खतरे के सामने कमजोर पड़ सकते हैं।
स्पष्ट है कि ड्रोन अब सिर्फ कैमरा उड़ाने का साधन नहीं रहे। ये एक नया “खामोश हथियार” बन चुके हैं। अगर समय रहते इस खतरे को नहीं रोका गया, तो पूर्वोत्तर भारत में सुरक्षा का पूरा समीकरण बदल सकता है -जहां बिना बड़ी सेना के भी हवाई हमले संभव हो जाएंगे।
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