भारत के युवाओं से राजीव चंद्रशेखर ने पूछा बड़ा सवाल। राजनीति में हंगामे से ज्यादा विकास, रोजगार, बेहतर सुविधाएं और जवाबदेही क्यों जरूरी हैं?
भारत दुनिया में सबसे ज्यादा युवा आबादी वाला देश है। आने वाले 50 साल में देश की राजनीति और लोकतंत्र किस दिशा में जाएंगे, यह काफी हद तक आज के युवाओं की सोच पर निर्भर करेगा। युवा किस तरह की सरकार चाहते हैं, उनके लिए विकास का क्या मतलब है और वे नेताओं से किस तरह के काम की उम्मीद करते हैं, ये सवाल अब पहले से ज्यादा जरूरी हो गए हैं।
इसी मुद्दे पर पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी केरल प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर (Rajeev Chandrasekhar) ने एक लेख में भारत की राजनीति, सरकारी कामकाज और युवाओं की भूमिका पर अपनी बात रखी है। उनका कहना है कि राजनीति में बहस और विरोध जरूरी हैं, लेकिन जब हर मुद्दे पर हंगामा होने लगे और सरकार के कामकाज पर चर्चा पीछे छूट जाए, तो इसका सबसे ज्यादा नुकसान युवाओं को होता है।
2004 से 2014 के भारत और आज के भारत में क्या बदला?
लेख में 2004 से 2014 के समय को 'Lost Decade' यानी खोया हुआ दशक बताया गया है। लेखक के मुताबिक, उस दौर में कई लोगों के लिए कामयाबी का रास्ता उनकी योग्यता से ज्यादा पहचान और संपर्क पर निर्भर करता था। कारोबार में भी कई बार अच्छे आइडिया और काम करने की क्षमता से ज्यादा राजनीतिक संपर्कों को फायदा मिलता था। लेख में 2012 की Credit Suisse रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया है कि देश के 10 बड़े कारोबारी समूहों पर भारतीय बैंकिंग सिस्टम की कुल नेटवर्थ के करीब 98 फीसदी के बराबर कर्ज था। इस तरह की व्यवस्था में छोटे कारोबारियों, दुकानदारों और नए कारोबार शुरू करने वाले युवाओं के लिए बैंक से कर्ज लेना मुश्किल हो जाता था। इसके मुकाबले आज की व्यवस्था में सरकार की ओर से डिजिटल पेमेंट और सीधे बैंक खातों में पैसा भेजने पर जोर दिया गया है।
JAM Trinity से बदली सरकारी योजनाओं में पैसे भेजने की व्यवस्था
लेख में जनधन, आधार और मोबाइल यानी JAM Trinity को सरकारी व्यवस्था में बड़े बदलाव का हिस्सा बताया गया है। इस व्यवस्था के जरिए सरकारी योजनाओं का पैसा सीधे लोगों के बैंक खातों में भेजने की शुरुआत हुई। इससे बीच में पैसा लेने वाले लोगों की भूमिका कम करने में मदद मिली। 2014 के बाद से अब तक 53 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा सीधे लोगों के बैंक खातों में भेजे जा चुके हैं। पहले सरकारी योजनाओं का पैसा जरूरतमंद लोगों तक पहुंचने से पहले कई स्तरों से गुजरता था। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के पुराने बयान का जिक्र करते हुए लेख में कहा गया है कि सरकारी मदद का केवल 15 पैसा ही असल लाभार्थी तक पहुंचता था। अब DBT यानी Direct Benefit Transfer के जरिए इस समस्या को कम करने की कोशिश की गई है।
गरीबी कम होने और किसानों को मदद मिलने का दावा
नीति आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा गया है कि 2013-14 से 2022-23 के बीच करीब 25 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर आए। आंकड़ों के मुताबिक, देश में बहुआयामी गरीबी का स्तर 2013-14 में 29.17 फीसदी था, जो 2022-23 में घटकर 11.28 फीसदी रह गया। किसानों को मिलने वाली सरकारी मदद का भी जिक्र है। इसके मुताबिक, किसानों को करीब 4.47 लाख करोड़ रुपये की मदद दी गई है। प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि जैसी योजनाओं के जरिए पैसा सीधे किसानों के खातों में पहुंचाया जा रहा है। इनके अनुसार- जब किसी परिवार की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है और किसान को सरकारी मदद सीधे मिलती है, तो इसका फायदा लंबे समय तक दिखाई देता है।
कर्नाटक और केरलम की सरकारों पर भी उठाए सवाल
लेख में केवल केंद्र सरकार के कामकाज की बात नहीं की गई है, बल्कि विपक्षी दलों की सरकार वाले राज्यों के आर्थिक हालात पर भी सवाल उठाए गए हैं। कर्नाटक का उदाहरण देते हुए प्रदेश अध्यक्ष ने कहा है कि राज्य का कर्ज एक साल में 90,280 करोड़ रुपये से बढ़कर 1.04 लाख करोड़ रुपये हो गया। लेख के मुताबिक, सरकार की गारंटी योजनाओं पर करीब 52 हजार करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इन योजनाओं के कारण सड़कों, अस्पतालों और इंडस्ट्री से जुड़े कामों के लिए जरूरी बजट पर दबाव पड़ रहा है।
वहीं केरलम की पिछली वामपंथी सरकार के 10 साल के कामकाज पर भी सवाल उठाए गए हैं। लेख में जून 2026 में पेश किए गए व्हाइट पेपर का हवाला देते हुए राज्य पर 5.07 लाख करोड़ रुपये का कर्ज होने की बात कही गई है। इसमें यह भी बताया गया है कि 2025 में राज्य को 84 दिन तक RBI के ओवरड्राफ्ट का सहारा लेना पड़ा। इनके अनुसार, राज्य का कैपिटल एक्सपेंडिचर यानी सड़क, अस्पताल और दूसरी बड़ी सुविधाओं पर होने वाला खर्च GSDP का केवल 1.3 फीसदी था।
यूपी और महाराष्ट्र के विकास का दिया उदाहरण
केरल प्रदेश अध्यक्ष के लेख में उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र का उदाहरण भी दिया गया है। उत्तर प्रदेश की अर्थव्यवस्था पिछले नौ साल में बढ़कर 36 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। लेख के अनुसार- यूपी में दंगों पर रोक लगी है, राज्य की कमाई बढ़ी है और निवेशकों का भरोसा मजबूत हुआ है। महाराष्ट्र को लेकर कहा गया है कि विदेशी निवेश यानी FDI के मामले में राज्य देश में पहले नंबर पर है। एक तिमाही में देश में आए कुल विदेशी निवेश का आधे से ज्यादा हिस्सा महाराष्ट्र में आया।
विरोध जरूरी, लेकिन संसद और सड़कों पर हंगामा कितना सही?
राजीव चंद्रशेखर के मुताबिक- सरकार के खिलाफ प्रदर्शन करना, गलत फैसलों पर सवाल उठाना और जनता की समस्याओं को उठाना लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है। उन्होंने खुद भी अपने सार्वजनिक जीवन में कई विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लेने की बात कही है। लेकिन उनका सवाल है कि जब संसद में किसी खास मुद्दे पर चर्चा करने के बजाय लगातार काम रोकने की कोशिश हो या हाईवे बंद करके दबाव बनाया जाए, तो इससे आम लोगों को क्या फायदा मिलता है? सरकार के कामकाज पर सवाल पूछना जरूरी है, लेकिन केवल हंगामा करना किसी दूसरी बेहतर योजना या विकल्प का जवाब नहीं हो सकता।
युवाओं को किस तरह की राजनीति चाहिए?
उन्होंने युवाओं के सामने एक सीधा सवाल रखा है। क्या ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जहां किसी व्यक्ति को उसकी पढ़ाई, स्किल, मेहनत और काम के आधार पर आगे बढ़ने का मौका मिले या फिर सफलता के लिए राजनीतिक पहचान और संपर्क जरूरी हों? युवाओं के लिए यह समझना भी जरूरी है कि सरकार केवल आज की जरूरतों को पूरा करने के लिए काम करती है या सड़क, अस्पताल, स्कूल और इंडस्ट्री जैसी सुविधाएं बनाकर आने वाले समय की तैयारी भी करती है। भारत के युवाओं को सरकारों से उनके काम का हिसाब मांगना चाहिए। केवल राजनीतिक बयान, आरोप और हंगामे के आधार पर किसी सरकार के कामकाज को नहीं समझना चाहिए। लोकतंत्र में सबसे जरूरी सवाल यही होना चाहिए कि कौन सी सरकार लोगों के लिए बेहतर सुविधाएं बना रही है और कौन सी सरकार आने वाली पीढ़ियों पर आर्थिक बोझ छोड़ रही है। युवाओं की भागीदारी और उनकी राजनीतिक समझ ही आने वाले समय में भारत के लोकतंत्र की दिशा तय करेगी।




