Who IS Mohammad Bagher Zolghadr: ईरान ने मोहम्मद बाकेर जोलकद्र को सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का नया सचिव बनाया है। पूर्व IRGC कमांडर रहे जोलकद्र की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब क्षेत्र में तनाव बढ़ा हुआ है।

मध्य-पूर्व की राजनीति में इन दिनों बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। हाल ही में ईरान की सरकार ने एक अहम फैसला लेते हुए मोहम्मद बाकेर जोलकद्र को देश की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल का नया सचिव नियुक्त किया है। यह वही संस्था है जो ईरान की सुरक्षा, विदेश नीति और रणनीतिक फैसलों में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।

जोलकद्र ने इस पद पर अली लारीजानी की जगह ली है, जिनकी 17 मार्च को इजराइली हमले में मौत हो गई थी। इस नियुक्ति की जानकारी ईरानी राष्ट्रपति के कम्युनिकेशन डिपार्टमेंट के एक अधिकारी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X के जरिए दी। जोलकद्र इससे पहले इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) में वरिष्ठ कमांडर रह चुके हैं और ईरान की सैन्य और राजनीतिक व्यवस्था में उन्हें काफी प्रभावशाली माना जाता है।

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कौन हैं मोहम्मद बाकेर जोलकद्र

मोहम्मद बाकेर जोलकद्र का जन्म 1954 में ईरान के फासा शहर में हुआ था। उन्होंने तेहरान यूनिवर्सिटी से इकोनॉमिक्स में बैचलर डिग्री हासिल की। उनकी पत्नी सदीगेह बेगम हेजाजी हैं, जो 2007 से ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कल्चर एंड कम्युनिकेशन में महिला और परिवार मामलों के कार्यालय की प्रमुख हैं।

उनके परिवार का भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रभाव देखा जाता है। उनके दामाद काजेम गरीबाबादी वियना में संयुक्त राष्ट्र कार्यालय में ईरान के स्थायी प्रतिनिधि हैं और अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) में भी देश का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस्लामी क्रांति से पहले भी रहे सक्रिय

1979 की इस्लामी क्रांति से पहले जोलकद्र ‘मंसूरून’ नाम के एक संगठन से जुड़े हुए थे। यह समूह उस समय ईरान में सक्रिय कई क्रांतिकारी संगठनों में से एक माना जाता था। 1978 में उन पर और मोहसिन रेजाई पर एक अमेरिकी इंजीनियर और एक तेल कंपनी के मैनेजर की हत्या में शामिल होने के आरोप भी लगे थे। बाद में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव 1747 के तहत उन्हें ईरान के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम से जुड़े होने के कारण प्रतिबंध सूची में भी शामिल किया गया था।

IRGC की खुफिया व्यवस्था से जुड़ी अहम भूमिका

इस्लामी क्रांति के बाद मंसूरून समेत कई समूहों को मिलाकर एक नया ढांचा बनाया गया, जिसने आगे चलकर इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स की खुफिया इकाई की नींव रखी। इस व्यवस्था को खड़ा करने में जोलकद्र, मोहसिन रेजाई और अहमद वहीदी जैसे नेताओं की अहम भूमिका मानी जाती है। यही खुफिया ढांचा आगे चलकर ईरान की सुरक्षा व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया।

ईरान-इराक युद्ध में निभाई बड़ी भूमिका

1980 से 1988 तक चले ईरान-इराक युद्ध के दौरान जोलकद्र ब्रिगेडियर जनरल के पद पर थे और टॉप सैन्य कमांडरों में गिने जाते थे। उन्हें मिलिट्री डिविजन रमजान गैरीसन का सह-संस्थापक और कमांडर भी माना जाता है। यह कैंप 1983 में बनाया गया था और इसका मुख्य काम ईरान के बाहर गतिविधियों को संचालित करना था। बाद में यही ढांचा IRGC की विदेशी शाखा कुद्स फोर्स की नींव बना। युद्ध के दौरान इस कैंप के जरिए इराक में ईरान समर्थित समूहों को ट्रेनिंग दी जाती थी और कई शिया संगठनों के साथ मिलकर काम किया गया।

IRGC में लंबे समय तक अहम पदों पर रहे

ईरान-इराक युद्ध खत्म होने के बाद भी जोलकद्र लंबे समय तक IRGC में महत्वपूर्ण पदों पर बने रहे। 1989 से 1997 तक वे IRGC के जॉइंट स्टाफ के प्रमुख रहे, जो कमांड स्ट्रक्चर में तीसरे नंबर का पद माना जाता है। इसके बाद 1997 से 2005 तक वे डिप्टी कमांडर इन चीफ बने, यानी संगठन के दूसरे सबसे ताकतवर अधिकारी। उनकी इस तेजी से बढ़ती भूमिका में उस समय के वरिष्ठ कमांडरों मोहसिन रेजाई और रहीम सफवी से उनकी नजदीकी भी अहम मानी जाती है।

राजनीतिक विवादों में भी रहा नाम

1990 के दशक के आखिर में जब ईरान में सुधारवादी राजनीति उभर रही थी, तब जोलकद्र और कुछ अन्य सैन्य अधिकारियों ने खुले तौर पर उसका विरोध किया था। उन पर 9 जुलाई 1999 को यूनिवर्सिटी हॉस्टल पर हुए हमले में शामिल होने के आरोप भी लगे थे। इसके अलावा उन्होंने 24 सैन्य अधिकारियों के उस पत्र पर भी हस्ताक्षर किए थे, जिसमें तत्कालीन राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी को चेतावनी दी गई थी।

क्यों अहम है यह नियुक्ति

मोहम्मद बाकेर जोलकद्र की नियुक्ति ऐसे समय हुई है जब मध्य-पूर्व में तनाव लगातार बढ़ रहा है। ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल देश की रक्षा नीति, विदेश संबंधों और परमाणु कार्यक्रम जैसे बड़े फैसलों में अहम भूमिका निभाती है। ऐसे में एक अनुभवी सैन्य अधिकारी को इस पद पर लाना ईरान की रणनीति में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है।

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