जिस ‘लेडी सिंघम’ पर गर्व था, वही रिश्वत लेते पकड़ी गई! गाजियाबाद पुलिस शर्मसार!
गाजियाबाद की ‘लेडी सिंघम’ कही जाने वाली महिला दरोगा भुवनेश्वरी सिंह रिश्वत लेते रंगे हाथ गिरफ्तार हुईं। एनकाउंटर की हीरो अब दहेज केस में 45 हजार की रिश्वत कांड में फंसीं, मेरठ एंटी करप्शन टीम ने की कार्रवाई।

जिस वर्दी पर तालियां बजीं, उसी पर अब सवाल
कुछ महीने पहले तक जिस महिला दरोगा की बहादुरी की मिसालें दी जा रही थीं, आज वही नाम गाजियाबाद पुलिस के लिए असहज करने वाली सुर्खियों में है। ‘लेडी सिंघम’ कहकर सम्मानित की गई दारोगा भुवनेश्वरी सिंह अब रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ पकड़ी गई हैं। मेरठ एंटी करप्शन टीम की इस कार्रवाई ने न सिर्फ एक अफसर की छवि गिराई, बल्कि पूरे महकमे को कठघरे में खड़ा कर दिया है।
23 सितंबर 2025 को गाजियाबाद के सिहानी गेट इलाके में हुआ एनकाउंटर प्रदेशभर में चर्चा का विषय बना था। यह पहला मौका था, जब महिला पुलिसकर्मियों की टीम ने एनकाउंटर को अंजाम दिया। इसी टीम में शामिल भुवनेश्वरी सिंह की वह तस्वीर, जिसमें वह घायल बदमाश को कंधे पर उठाकर अस्पताल ले जाती दिखीं, सोशल मीडिया पर खूब वायरल हुई। पुलिस कमिश्नर जे. रविंद्र गौड़ ने उन्हें इस साहस के लिए सम्मानित भी किया था।
दहेज केस की जांच और रिश्वत का आरोप
मामला साहिबाबाद के वृंदावन गार्डन निवासी रामपाल सैनी के परिवार से जुड़ा है। रामपाल के बेटे के खिलाफ उसकी पत्नी ने दहेज उत्पीड़न का केस दर्ज कराया था। इस केस की जांच दारोगा भुवनेश्वरी सिंह के पास थी। आरोप है कि उन्होंने परिवार के अन्य सदस्यों के नाम केस से बाहर रखने और राहत दिलाने के बदले एक लाख रुपये की मांग की। पीड़ित की मिन्नतों के बाद सौदा 50 हजार रुपये में तय हुआ।
मंगलवार, 14 जनवरी को पीड़ित तय रकम से 5 हजार कम यानी 45 हजार रुपये लेकर चौकी पहुंचा। जैसे ही दारोगा ने पैसे लेकर मेज की दराज में रखे, पहले से तैनात मेरठ एंटी करप्शन टीम ने कार्रवाई करते हुए उन्हें रंगे हाथ पकड़ लिया। मौके से रिश्वत की रकम भी बरामद कर ली गई।
पहले भी लग चुके हैं गंभीर आरोप
भुवनेश्वरी सिंह मूल रूप से अलीगढ़ की रहने वाली हैं और 2002 बैच की दरोगा हैं। बताया जाता है कि पढ़ाई और खेल में वह हमेशा आगे रहीं, लेकिन पुलिस सेवा के दौरान उनका नाम कई बार विवादों में आया। साल 2022 में कानपुर में तैनाती के दौरान भी उन पर एक सेक्स रैकेट मामले में व्यापारियों से 15 लाख रुपये की मांग का आरोप लगा था। उस समय भी वह 50 हजार रुपये की रिश्वत लेते पकड़ी गई थीं।
फील्ड पोस्टिंग के बाद फिर वही कहानी
पहले रिश्वत कांड के बावजूद उन्हें दोबारा फील्ड पोस्टिंग मिलना कई सवाल खड़े करता है। अब एक बार फिर गिरफ्तारी के बाद न सिर्फ उनके करियर पर संकट गहरा गया है, बल्कि गाजियाबाद पुलिस की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
पुलिस की छवि पर असर
जिस अफसर को कुछ समय पहले बहादुरी का प्रतीक बताया जा रहा था, वही अब भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरी है। यह मामला साफ तौर पर दिखाता है कि एक गलत कदम कैसे वर्षों की मेहनत और सम्मान को मिट्टी में मिला देता है। अब सबकी नजर इस पर है कि आगे की कार्रवाई कितनी सख्त और पारदर्शी होती है।
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