लखनऊ के अलीगंज अग्निकांड की जांच में बायोमेट्रिक लॉक, इमरजेंसी एग्जिट की कमी, फायर NOC न होने और अवैध निर्माण जैसी कई गंभीर खामियां उजागर हो रही हैं।

Lucknow Fire: लखनऊ के अलीगंज इलाके में एक कमर्शियल बिल्डिंग में लगी भीषण आग, जिसमें 15 लोगों की मौत हो गई थी, उसकी जांच में सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ी कई गंभीर कमियां सामने आई हैं। शुरुआती जांच में ऐसे संकेत मिले हैं कि आग लगने के बाद बिल्डिंग के अंदर मौजूद लोग बाहर नहीं निकल पाए और अंदर ही फंस गए। अधिकारी इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या आग से बचाव के बुनियादी इंतजामों की कमी, ऑटोमैटिक लॉकिंग सिस्टम और भवन निर्माण नियमों के कथित उल्लंघन ने इस हादसे में मौतों की संख्या बढ़ाने में भूमिका निभाई। मामले में बिल्डिंग मालिकों समेत चार लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जबकि चार अधिकारियों को निलंबित कर दिया गया है।

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एक ही एंट्री-एग्जिट

घटनास्थल पर सबसे पहले पहुंचने वाले फायर विभाग के कर्मचारियों के अनुसार, पूरी बिल्डिंग में ऊपर-नीचे जाने के लिए केवल एक सीढ़ी थी और आने-जाने के लिए भी एक ही कॉमन रास्ता उपलब्ध था। इसके चलते बड़ी संख्या में एक साथ लोगों को बाहर निकल पाना आसान नहीं था। बचाव अभियान में शामिल टीमों ने पाया कि आग और धुआं बहुत तेजी से पूरी इमारत में फैल गया था। इसकी वजह से अंदर मौजूद छात्र न तो सुरक्षित तरीके से बाहर निकल पाए और न ही छत तक पहुंचकर खुद को बचा सके।

बायोमेट्रिक सिस्टम पर उठे सवाल

जांच से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, बिल्डिंग में संचालित एनिमेशन कोचिंग सेंटर के मुख्य प्रवेश द्वार पर ऑटोमैटिक बायोमेट्रिक एक्सेस कंट्रोल सिस्टम लगा हुआ था। जांच एजेंसियों को आशंका है कि आग लगने के बाद यही इलेक्ट्रॉनिक लॉक लोगों के बाहर निकलने में बाधा बना होगा। बताया जा रहा है कि आग के दौरान इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम ने काम करना बंद कर दिया था और ऑटोमैटिक लॉक जाम हो गया था। इससे लोग भीतर ही फंस गए।

इमरजेंसी एग्जिट की कमी

शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि बिल्डिंग में इमरजेंसी एग्जिट की कोई व्यवस्था नहीं थी। ऐसे में आग लगने के बाद लोगों के पास बाहर निकलने का कोई वैकल्पिक रास्ता नहीं बचा। फायरकर्मियों के मुताबिक, बिल्डिंग में आने-जाने का रास्ता बेहद सीमित था। इसी कारण बचाव दल को लोगों तक पहुंचने के लिए एक दीवार तोड़नी पड़ी। इसके अलावा, कई लोगों को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए पड़ोस की बिल्डिंग की छत का सहारा लेना पड़ा। सीमित पहुंच के कारण राहत और बचाव कार्य में भी काफी मुश्किलें आईं।

फायर NOC भी नहीं

जांच एजेंसियां फायर सेफ्टी नियमों के कथित उल्लंघन की भी पड़ताल कर रही हैं। इसमें फायर विभाग से जरूरी 'नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट' (NOC) नहीं लेने का मामला भी शामिल है। फायर विभाग के अधिकारियों के अनुसार, बिल्डिंग के भीतर आग बुझाने के पर्याप्त संसाधन और सुरक्षा उपकरण मौजूद नहीं थे, जिससे हालात और गंभीर हो गए।

अवैध निर्माण की भी जांच

जांच के दौरान यह आरोप भी सामने आया है कि जिस बिल्डिंग को मूल रूप से एक मंजिला भवन के रूप में मंजूरी मिली थी, उसे बाद में तीन मंजिला कमर्शियल कॉम्प्लेक्स में बदल दिया गया। लखनऊ डेवलपमेंट अथॉरिटी (LDA) और लखनऊ नगर निगम के रिकॉर्ड के अनुसार, इस भवन को शुरुआत में रिहायशी उपयोग के लिए मंजूरी दी गई थी। हालांकि, बाद में इसका इस्तेमाल व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जाने लगा। अधिकारियों का कहना है कि वे यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि भवन के उपयोग में यह बदलाव कब और किन परिस्थितियों में किया गया।

मालिकों और संबंधित पक्षों की भूमिका की जांच जारी

जांच अधिकारियों के अनुसार, यह संपत्ति वीरेंद्र प्रसाद शुक्ला, सुरेंद्र शुक्ला और धीरेंद्र शुक्ला नामक तीन भाइयों की है। आरोप है कि रिहायशी भवन की मंजूरी होने के बावजूद इसे कमर्शियल कॉम्प्लेक्स के रूप में विकसित और संचालित किया गया। जानकारी के मुताबिक, भवन की ऊपरी मंजिलों पर एक एनिमेशन ट्रेनिंग सेंटर संचालित हो रहा था, जबकि दूसरी मंजिल पर एक पेट क्लिनिक भी चल रहा था।