Bengal Voter List Case: पश्चिम बंगाल की CM ममता बनर्जी वोटर लिस्ट संशोधन (SIR) में गड़बड़ी के खिलाफ वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट में पेश हुईं। उन्होंने प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाया है।

नई दिल्ली: पश्चिम बंगाल में वोटर लिस्ट के गहन संशोधन (SIR) से जुड़े मामले में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद पेश होने वाली हैं। ममता बनर्जी ने बंगाल में SIR के खिलाफ याचिका पर आज खुद पेश होने की इजाजत मांगी थी। चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच इन याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। खबर है कि ममता बनर्जी को पेश होने की इजाजत मिल गई है। तृणमूल कांग्रेस ने ममता की एक तस्वीर भी शेयर की है, जिसमें वह वकील का कोट पहनकर सुप्रीम कोर्ट की सीढ़ियां चढ़ रही हैं। भारतीय इतिहास में यह एक दुर्लभ घटना है कि कोई मुख्यमंत्री वकील के रूप में सुप्रीम कोर्ट में बहस करने आ रहा हो। ममता बनर्जी की याचिका में आरोप है कि बंगाल में वोटर लिस्ट के गहन संशोधन में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हुई है। इसी मुद्दे को लेकर तृणमूल कांग्रेस ने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। बंगाल में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, ऐसे में ममता बनर्जी का यह कदम काफी अहम है।

क्या है वोटर लिस्ट का मामला?

वोटर लिस्ट के गहन संशोधन के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट से तत्काल हस्तक्षेप की मांग करते हुए मुख्यमंत्री ने पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। मुख्यमंत्री ने राज्य में SIR प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं का आरोप लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई है। यह भी ध्यान देने वाली बात है कि ममता बनर्जी ने यह नई याचिका तब दायर की है जब तृणमूल कांग्रेस द्वारा इसी मुद्दे पर दायर एक याचिका पहले से ही अदालत में विचाराधीन है। ममता बनर्जी ने शुरू से ही राज्य में वोटर लिस्ट संशोधन का कड़ा विरोध किया है। तृणमूल ने भी यही रुख अपनाया है कि बड़े पैमाने पर गड़बड़ी हो रही है और यह चुनाव में धांधली करने की एक चाल है। इस बीच, यह बात भी ध्यान खींच रही है कि मुख्यमंत्री खुद सुप्रीम कोर्ट में कानूनी लड़ाई लड़ने जा रही हैं।

क्या SIR न्यायिक समीक्षा से भी ऊपर है?

पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने यह सवाल उठाया था कि क्या चुनाव आयोग द्वारा किया जा रहा वोटर लिस्ट का व्यापक संशोधन न्यायिक समीक्षा से भी परे है। देश भर में SIR प्रक्रिया को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली बेंच ने यह सवाल उठाया था। जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने यह भी कहा था कि प्रक्रिया प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप और निष्पक्ष होनी चाहिए। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया कि नागरिकता की जांच केवल चुनावी प्रक्रिया के लिए है, किसी को देश से निकालने के लिए नहीं। चुनाव आयोग ने दावा किया कि कामकाज उदारतापूर्वक और बिना किसी दबाव के किया जा रहा है।