Nepal Tibet Border Flood: नेपाल-तिब्बत सीमा पर ग्लेशियर टूटने से आई विनाशकारी बाढ़ ने भारी तबाही मचाई। सैटेलाइट तस्वीरों और वैज्ञानिक आकलन से संकेत मिले हैं कि इस आपदा के खतरे के निशान पहले ही दिखाई दे चुके थे।

काठमांडू: नेपाल-तिब्बत सीमा के पहाड़ी इलाके में ग्लेशियर टूटने के बाद आई विनाशकारी बाढ़ ने बड़े पैमाने पर तबाही मचा दी है। त्रिशूली नदी के किनारे बसे इलाकों से लेकर हाइड्रोपावर परियोजनाओं तक बाढ़ और मलबे ने भारी नुकसान पहुंचाया है। लेकिन इस आपदा के बाद सामने आई सैटेलाइट तस्वीरों और वैज्ञानिक आकलन ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या इस तबाही के संकेत पहले ही मिल चुके थे?

रिपोर्ट के मुताबिक, आपदा से कुछ दिन पहले ही ग्लेशियर और आसपास के इलाके में ऐसे बदलाव दिखाई देने लगे थे, जिन्हें संभावित खतरे के संकेत माना जा सकता था। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर इन संकेतों को समय रहते प्रभावी अर्ली वार्निंग सिस्टम से जोड़ा जाता, तो निचले इलाकों में रहने वाले लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के लिए कुछ समय मिल सकता था।

सैटेलाइट तस्वीरों में दिखे थे बदलाव

HiRISK के आकलन में आपदा से पहले ग्लेशियर क्षेत्र में कई असामान्य बदलाव दर्ज किए गए। वैज्ञानिकों ने ग्लेशियर के भीतर पानी के प्रवाह में तेजी और आसपास की चट्टानी ढलानों में अस्थिरता के संकेत देखे।

24 अगस्त की सैटेलाइट तस्वीरों में पिघले पानी का रंग भूरा नजर आया। इसके अलावा पास की चट्टानी ढलान पर एक बढ़ती हुई दरार भी दिखाई दी। वैज्ञानिकों के मुताबिक, ये बदलाव इलाके में बढ़ती अस्थिरता की ओर इशारा कर सकते थे।

यही वजह है कि अब विशेषज्ञ इस बात पर जोर दे रहे हैं कि हिमालय जैसे दुर्गम इलाकों में सैटेलाइट निगरानी और अर्ली वार्निंग सिस्टम को और मजबूत किया जाना चाहिए।

रासुवागढ़ी से नीचे तक पहुंच सकता था अलर्ट

आपदा का एक अहम क्षेत्र नेपाल-चीन सीमा के पास स्थित रासुवागढ़ी (Gyirong Port) है। सैटेलाइट मैप में इस इलाके और त्रिशूली नदी की दिशा को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, ग्लेशियर या हिमस्खलन से शुरू हुई घटना इतनी तेजी से आगे बढ़ सकती है कि स्रोत के बिल्कुल पास मौजूद लोगों को पारंपरिक चेतावनी प्रणाली के जरिए पर्याप्त समय मिलना मुश्किल हो। लेकिन नीचे की ओर बसे इलाकों में 10 मिनट या उससे अधिक का समय भी लोगों को सुरक्षित निकालने के लिए बेहद अहम साबित हो सकता था।

भू-विज्ञानी जैकब स्टीनर ने इस क्षेत्र में शुरुआती चेतावनी व्यवस्था को कमजोर बताया है। उनका कहना है कि हाई माउंटेन एशिया में हजारों ग्लेशियर हैं और हर जगह पारंपरिक तरीके से निगरानी करना बेहद मुश्किल है।

त्रिशूली नदी के किनारे तबाही, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट भी प्रभावित

बाढ़ का असर त्रिशूली नदी की घाटी में बड़े स्तर पर दिखाई दिया है। नदी के किनारे बसे इलाकों में मलबा फैल गया और कई निर्माण तथा हाइड्रोपावर परियोजनाएं प्रभावित हुईं।

दूसरी सैटेलाइट तस्वीर में त्रिशूली नदी के आसपास मौजूद कई हाइड्रोपावर परियोजनाओं को चिन्हित किया गया है। तस्वीर में 60 MW, 20 MW और 22 MW समेत कई परियोजनाएं दिखाई गई हैं। यह पूरा इलाका पहले भी रॉक-आइस एवलॉन्च और भूकंपीय घटनाओं से प्रभावित रहा है।

मैप में जुलाई 2024 के रॉक-आइस एवलॉन्च और अप्रैल 2015 के भूकंप से जुड़े रॉक-आइस एवलॉन्च को भी चिन्हित किया गया है। इससे पता चलता है कि यह पूरा पहाड़ी क्षेत्र लंबे समय से प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से संवेदनशील रहा है।

सुरंगों में फंसे लोगों की तलाश जारी

बाढ़ और मलबे के कारण कई जगहों पर निर्माण स्थलों और सुरंगों में काम कर रहे लोगों के फंसे होने की आशंका है। राहत और बचाव दल लगातार मलबा हटाने, खुदाई और ड्रिलिंग के जरिए लोगों की तलाश कर रहे हैं।

कई जगहों पर मलबा इतना ज्यादा है कि बचाव अभियान बेहद मुश्किल हो गया है। बंद सुरंगों से शव मिलने के बाद लापता लोगों के परिवारों की चिंता और बढ़ गई है।

मौतों का आंकड़ा 1,000 के पार, हजारों लोग लापता

रिपोर्ट के मुताबिक, इस आपदा में मरने वालों की संख्या 1,000 से ज्यादा हो चुकी है, जबकि करीब 4,500 लोग अब भी लापता बताए जा रहे हैं। नुवाकोट जिले में ड्रोन सर्वे के दौरान एक घर में 24 शव मिलने की जानकारी सामने आई है। वहीं, भारत की ओर बहकर आए शवों ने भी आपदा की भयावहता को सामने ला दिया है।

हालांकि, आपदा के बाद राहत और बचाव अभियान जारी रहने के कारण मृतकों और लापता लोगों के आंकड़ों में बदलाव संभव है।

क्या बेहतर चेतावनी से बच सकती थीं जानें?

इस पूरी घटना ने हिमालयी क्षेत्र में आपदा की पहले से पहचान और लोगों तक तत्काल चेतावनी पहुंचाने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि सैटेलाइट तस्वीरों, रिमोट सेंसिंग, सेंसर और AI-assisted monitoring जैसी तकनीकों को मिलाकर ग्लेशियरों की लगातार निगरानी की जा सकती है। इससे ग्लेशियर झीलों, बर्फ और चट्टानों में होने वाले असामान्य बदलावों को जल्दी पहचाना जा सकता है।

हिमालय में हजारों ग्लेशियर और बेहद दुर्गम इलाके हैं। ऐसे में हर संवेदनशील स्थान पर इंसानी निगरानी संभव नहीं है। यही कारण है कि वैज्ञानिक अब ऐसी तकनीक विकसित करने पर जोर दे रहे हैं जो बड़े इलाके में संभावित खतरे का पता लगाकर नीचे बसे गांवों, श्रमिकों और हाइड्रोपावर परियोजनाओं को समय रहते अलर्ट कर सके।