क्या PoK में एक जनआंदोलन को आतंकवादी संगठन घोषित कर असहमति की आवाज़ दबाई जा रही है? JKJAAC कार्यकर्ता शाहज़ेब हबीब की मौत मुठभेड़ थी या फिर कथित गैर-न्यायिक हत्या? इंटरनेट बंद, सैकड़ों गिरफ्तारियां और बाहरी लोगों पर रोक-आखिर PoK में क्या छिपाया जा रहा है? चुनाव से ठीक पहले प्रतिबंध, दमन और हिंसा-क्या PoK में निष्पक्ष मतदान संभव होगा?
PoK Human Rights Crisis: पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर (PoK) से आ रही रूह कँपा देने वाली खबरों ने पूरी दुनिया को झकझोर कर रख दिया है। एक तरफ जहाँ पाकिस्तान खुद को लोकतंत्र का मसीहा बताता है, वहीं दूसरी तरफ PoK में अपनी ही जनता की आवाज़ को बारूद के दम पर कुचल रहा है। दो बड़े अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों-एमनेस्टी इंटरनेशनल और इंटरनेशनल ह्यूमन राइट्स फाउंडेशन (IHRF)-ने मंगलवार को एक आपातकालीन बयान जारी कर पाकिस्तान की इस क्रूरता का पर्दाफाश किया है। संगठनों ने चेतावनी दी है कि एक शांतिपूर्ण नागरिक आंदोलन को 'आतंकवादी संगठन' घोषित करना और बेगुनाह नागरिकों पर गोलियां बरसाना, वहाँ बुनियादी मानवाधिकारों के पूरी तरह खत्म होने का पुख्ता सबूत है।

ऑपरेशन 'ब्लैकआउट': बाहरी दुनिया से क्यों काटा गया PoK का संपर्क?
सस्पेंस और खौफ का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी हुक्मरानों ने पूरे PoK को एक अभेद्य किले में तब्दील कर दिया है। IHRF ने बेहद चौंकाने वाला खुलासा करते हुए बताया कि इंटरनेट और मोबाइल नेटवर्क को कम से कम 12 जून तक के लिए पूरी तरह ठप कर दिया गया है। इतना ही नहीं, पर्यटकों और बाहरी लोगों को तुरंत इलाका छोड़ने का फरमान सुनाया गया है और 20 जून तक किसी भी बाहरी व्यक्ति के प्रवेश पर सख्त पाबंदी लगा दी गई है। मानवाधिकार संगठनों का मानना है कि इस 'डिजिटल ब्लैकआउट' और यात्रा प्रतिबंधों के पीछे पाकिस्तानी सेना का एक ही मकसद है-वहां हो रहे नरसंहार और जुल्म की दास्तानें बाहरी दुनिया तक न पहुंच सकें।
शाहज़ेब हबीब की मौत: एक घटना जिसने भड़का दिया गुस्सा
इस खूनी ड्रामे की शुरुआत तब हुई जब 'जम्मू-कश्मीर जॉइंट अवामी एक्शन कमेटी' (JKJAAC) और पाकिस्तानी सरकार के बीच बातचीत अचानक टूट गई। JKJAAC PoK की विधानसभा में उन 12 आरक्षित सीटों को खत्म करने की मांग कर रहा था, जिनका इस्तेमाल इस्लामाबाद की कठपुतली सरकारें चुनावों में हेरफेर करने के लिए करती हैं। बातचीत सुलझाने के बजाय, 5 जून को पाकिस्तान ने इस जन-आंदोलन को 'आतंकवादी संगठन' घोषित कर दिया। इसके ठीक बाद, कमिटी के प्रमुख कार्यकर्ता शाहज़ेब हबीब को पुलिस ने सरेराह गाड़ी में गोली मार दी। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसे साफ़ तौर पर एक 'गैर-न्यायिक हत्या' (Extra-judicial Execution) करार दिया है, क्योंकि शाहज़ेब से सुरक्षा बलों को कोई तात्कालिक खतरा नहीं था।
JKJAAC आखिर चाहता क्या है?
JKJAAC कोई नया संगठन नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में यह PoK में बिजली संकट, महंगाई, स्थानीय अधिकारों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे मुद्दों को लेकर प्रमुख जनआंदोलन के रूप में उभरा है। ताजा विवाद उन विधानसभा सीटों को लेकर शुरू हुआ जो 1947 के बाद पाकिस्तान गए जम्मू-कश्मीर के शरणार्थियों के लिए आरक्षित हैं। संगठन का आरोप है कि इन सीटों का इस्तेमाल स्थानीय राजनीतिक संतुलन को प्रभावित करने के लिए किया जाता है। जब सरकार और संगठन के बीच बातचीत विफल हो गई, तब क्षेत्रव्यापी हड़ताल की घोषणा की गई, जिसने घटनाओं की दिशा बदल दी।
अस्पताल के बाहर लाशों का ढेर: जब छावनी में बदला रावलकोट
शाहज़ेब की हत्या के बाद PoK की वादियों में गुस्सा लावा बनकर फूट पड़ा। 7 जून को जब रावलकोट के कंबाइंड मिलिट्री हॉस्पिटल के बाहर शाहज़ेब के शव के पोस्टमार्टम के दौरान हजारों लोग जुटे, तो पाकिस्तानी अर्धसैनिक बलों ने निहत्थे प्रदर्शनकारियों पर सीधी फायरिंग झोंक दी। इस भीषण झड़प में 8 प्रदर्शनकारी और 4 पुलिसकर्मी मौके पर ही ढेर हो गए। 8 और 9 जून तक हालात इतने बदतर हो चुके थे कि नागरिकों की मौत का कुल आंकड़ा 25 को पार कर गया, जिसमें महिलाएं भी शामिल हैं। सच दिखाने वाले यूट्यूबर और पत्रकार सोहराब बरकत को भी सलाखों के पीछे डाल दिया गया है और कमिटी के 100 से अधिक नेताओं को गिरफ्तार कर उनके दफ्तरों को सील कर दिया गया है।
क्या यह पहली बार हुआ है? पुरानी घटनाएं भी देती हैं संकेत
मानवाधिकार समूहों का दावा है कि मौजूदा संकट कोई अलग घटना नहीं है। इससे पहले 2024 और 2025 में भी JKJAAC से जुड़े प्रदर्शनों के दौरान हिंसक झड़पें हुई थीं, जिनमें प्रदर्शनकारियों और सुरक्षा बलों दोनों की मौतें हुई थीं। यही वजह है कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने इसे एक बार-बार दोहराए जाने वाले पैटर्न के रूप में देखा है। उनका कहना है कि यदि स्थिति को शांत करने के लिए तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में और अधिक हिंसा तथा अस्थिरता देखने को मिल सकती है।
क्रूरता का खूनी पैटर्न: दमन के साये में चुनावी ढोंग?
एमनेस्टी इंटरनेशनल की दक्षिण एशिया मामलों की डिप्टी रीजनल डायरेक्टर, इसाबेल लासी ने इस्लामाबाद को घेरते हुए कहा: "बिना किसी ठोस आधार के एक नागरिक संगठन को 'आतंकवादी' कहना और पूरे इलाके को सील कर देना बेहद अनुचित और गैर-कानूनी है।" IHRF और एमनेस्टी दोनों ने याद दिलाया कि यह कोई पहली घटना नहीं है। मई 2024 के लॉन्ग मार्च में भी पाकिस्तान ने असली गोलियां चलाकर 3 प्रदर्शनकारियों को मारा था, और अक्टूबर 2025 में भी 9 लोग मारे गए थे। यह एक सोची-समझी दमनकारी नीति है।
चुनाव से पहले बढ़ी बेचैनी, क्या निष्पक्ष मतदान संभव होगा?
सबसे बड़ा सस्पेंस तो यह है कि एक तरफ जहां PoK में लाशें गिर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तानी सरकार ने 27 जुलाई, 2026 को वहां क्षेत्रीय चुनाव कराने का ऐलान कर दिया है। मानवाधिकार संगठनों ने तीखी चेतावनी दी है कि जिस इलाके में जनता का मुख्य आंदोलन प्रतिबंधित हो, नेता जेल में हों और इंटरनेट बंद हो, वहां चुनाव कराना सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय ढोंग और मानवाधिकारों का मज़ाक उड़ाना है। क्या दुनिया इस जुल्म को रोक पाएगी, या PoK की आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी जाएगी? यह सवाल अब भी बरकरार है।


