क्या एक गर्भवती महिला को 120 किमी तक मौत से लड़ना पड़ा, क्योंकि रास्ते में न एम्बुलेंस थी और न डॉक्टर? क्या मारगन दर्रे की खतरनाक यात्रा ने जन्म से पहले ही एक मासूम की जिंदगी छीन ली? क्या 30,000 आबादी वाली मारवाह घाटी आज भी विशेषज्ञ स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित है? आखिर और कितनी माताओं को कंधों पर उठाकर ले जाना पड़ेगा, तब जागेगा स्वास्थ्य तंत्र?

Jammu Kashmir News: जम्मू-कश्मीर का किश्तवाड़ जिला अपनी प्राकृतिक खूबसूरती के लिए जाना जाता है, लेकिन इसी जिले की मारवाह तहसील के देहरना गांव में शनिवार को जो कुछ हुआ, उसने पूरी मानवता को झकझोर कर रख दिया। दोपहर के वक्त जब शाइस्ता बेगम नाम की महिला को अचानक प्रसव पीड़ा (लेबर पेन) शुरू हुई, तो परिवार के पैरों तले जमीन खिसक गई। गांव में न तो एम्बुलेंस आ सकती थी और न ही कोई गाड़ी, क्योंकि वहां चलने के लिए सड़कें ही नहीं थीं। तड़पती हुई गर्भवती महिला को बचाने के लिए परिवार के पास समय बहुत कम था। बिना एक पल गंवाए, परिजनों ने महिला को अपने कंधों पर उठाया और पथरीले, उबड़-खाबड़ रास्तों पर कई किलोमीटर का सफर पैदल ही तय करना शुरू किया। चारों तरफ सन्नाटा और पहाड़ों की ऊंचाई के बीच, अपनों को बचाने की जंग लड़ते हुए इन कंधों का मुकाबला सीधे मौत से था।

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खंडहर जैसी उम्मीद: क्या सच में वहां कोई मसीहा था?

घंटों की मशक्कत और चीखों के बीच, परिवार किसी तरह मुख्य सड़क तक पहुंचा। वहां से उन्होंने अपनी जेब टटोलकर एक निजी गाड़ी किराए पर ली और नवापाची स्थित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र (PHC) की तरफ दौड़े। उन्हें उम्मीद थी कि अस्पताल पहुंचते ही डॉक्टर उनकी तकलीफ को खत्म कर देंगे। लेकिन, जैसे ही वे अस्पताल की चौखट पर पहुंचे, उनके होश उड़ गए। उस पूरे स्वास्थ्य केंद्र में एक भी स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) मौजूद नहीं था।

30 हजार आबादी, फिर भी स्पेशलिस्ट डॉक्टर नहीं

मारवाह घाटी में 30,000 से अधिक लोग रहते हैं, लेकिन आज भी यहां विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएँ उपलब्ध नहीं हैं। आबादी की उम्मीद कहा जाने वाला यह PHC सिर्फ सफेद हाथी साबित हुआ। समय रेत की तरह हाथ से फिसल रहा था और मारवाह घाटी में कोई भी विशेषज्ञ डॉक्टर न होने के कारण, अब एक ऐसा फैसला लेना था जिसमें जिंदगी और मौत का फासला बेहद कम था। स्थानीय लोगों का कहना है कि PHC अक्सर डॉक्टरों के बिना चलता है और गंभीर मरीजों को सैकड़ों किलोमीटर दूर रेफर कर दिया जाता है। सर्दियों में जब भारी बर्फबारी के कारण मारगन दर्रा बंद हो जाता है, तब पूरी घाटी महीनों तक बाहरी दुनिया से कट जाती है।

'मारगन दर्रे' का खूनी सफर: 120 किलोमीटर का वो आखिरी इम्तिहान

अब पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं था। नासिर हुसैन लोन (महिला के पति) ने अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी दांव पर लगा दी। उन्होंने तुरंत अनंतनाग के सरकारी मेडिकल कॉलेज जाने का फैसला किया, जो वहां से पूरे 120 किलोमीटर दूर था। यह रास्ता कोई आम रास्ता नहीं था, बल्कि यह 'मारगन दर्रे' (Margan Pass) से होकर गुजरता है। मई का महीना खत्म होने को था, लेकिन इस दर्रे के तीखे मोड़ों पर आज भी बर्फ जमी हुई थी। एक तरफ ठंडी हवाएं, खतरनाक खाइयां और दूसरी तरफ गाड़ी के अंदर तड़पती एक मां। गाड़ी जैसे-जैसे आगे बढ़ रही थी, गर्भ में पल रहे मासूम की सांसें धीरे-धीरे थम रही थीं। इस बेहद मुश्किल और डरावने सफर के बीच, वो अनहोनी हो गई जिसका डर था। अस्पताल पहुंचने से पहले ही मासूम बच्चे ने अपनी मां के गर्भ में ही दम तोड़ दिया।

"भगवान से दुआ करते हैं कि ये पहाड़ उन्हें हमसे छीन न लें"

इस खौफनाक त्रासदी ने प्रशासनिक दावों की पोल खोलकर रख दी है। बेबस पति नासिर हुसैन ने रोते हुए कहा: "यहां हर गर्भावस्था मौत के साथ जुआ खेलने जैसा है। हमारे पास नाम के लिए अस्पताल है, लेकिन डॉक्टर नहीं। जब प्रसव पीड़ा शुरू होती है, तो हम अपनी महिलाओं को कंधों पर उठाकर ले जाते हैं और भगवान से यही दुआ करते हैं कि ये पहाड़ उन्हें हमसे छीन न लें।"

सबसे बड़ा सवाल: और कितनी जानें जाएंगी?

सर्दियों के दिनों में जब भारी बर्फबारी के कारण मारगन दर्रा बंद हो जाता है, तो यह पूरी घाटी दुनिया से कट जाती है। देहरना गांव के एक बुजुर्ग ने रोते हुए सिस्टम से एक कड़वा सवाल पूछा है, "सरकार हमारी बात सुने, उससे पहले हमें और कितनी माताओं को कंधों पर उठाकर ले जाना पड़ेगा? हमें और कितने बच्चों को खोना पड़ेगा?" आज मारवाह के लोग सिर्फ दो चीजें मांग रहे हैं-एक डॉक्टर और 24 घंटे चलने वाली एक एम्बुलेंस, ताकि अगली बार किसी मां की कोख सूनी न हो।