How Much does a Cheetah Cost Per Day in Kuno National Park: राष्ट्रपति मुर्मु के कूनो दौरे के बीच जानिए कूनो राष्ट्रीय उद्यान में एक चीते के भोजन पर रोज कितना खर्च होता है।
Droupadi Murmu Kuno Visit: राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु के कूनो राष्ट्रीय उद्यान (Kuno National Park) पहुंचते ही, मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित कूनो नेशनल पार्क और वहां के चीते एक बार फिर से सुर्खियों में आ गए हैं। यहां राष्ट्रपति ने चीता सफारी की विशेष कैप और जैकेट पहनकर चीता प्रोजेक्ट (Project Cheetah) की विस्तृत जानकारी प्राप्त की। जब भी कूनो राष्ट्रीय उद्यान का नाम आता है, चर्चा चीतों की संख्या, नए शावकों या उनकी गतिविधियों पर केंद्रित हो जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि भारत में दोबारा बसाए गए इन चीतों की देखभाल पर आखिर कितना खर्च (Cheetah Cost Per Day) होता है। हाल ही में मध्य प्रदेश विधानसभा में सामने आए आंकड़ों ने इस चर्चा को नया आयाम दे दिया है। सरकारी जानकारी के मुताबिक, कूनो में चीतों के लिए केवल बकरी के मांस की खरीद पर वित्तीय वर्ष 2024-25 में 1.27 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए गए। यह आंकड़ा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे आम लोगों को यह समझने का मौका मिलता है कि वन्यजीव संरक्षण की वास्तविक लागत क्या होती है।

रोजाना 49 हजार रुपये का खर्च, लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती
विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार कूनो में मौजूद चीतों के भोजन के लिए औसतन करीब 49 हजार रुपये से अधिक प्रतिदिन खर्च किए गए। यह राशि केवल बकरी के मांस की खरीद से जुड़ी है। दिलचस्प बात यह है कि वन विभाग ने स्पष्ट किया है कि चीतों को रोज कितनी मात्रा में मांस दिया जाएगा, इसका कोई तय मानक नहीं है। भोजन की मात्रा जानवरों की उम्र, स्वास्थ्य, गतिविधि और चिकित्सकीय जरूरतों के आधार पर तय की जाती है।

एक चीते पर कितना बैठता है खर्च?
अगर विधानसभा में बताए गए खर्च और उस समय कूनो में मौजूद 49 चीतों के आंकड़े को आधार मानें, तो औसतन एक चीते के भोजन पर प्रतिदिन लगभग 1,090 रुपये का खर्च बैठता है। हालांकि यह केवल एक अनुमानित औसत है। वास्तविक खर्च अलग-अलग चीते की जरूरतों के अनुसार कम या ज्यादा हो सकता है। इसके अलावा जंगल में खुले क्षेत्र में घूम रहे चीते कई बार प्राकृतिक शिकार भी करते हैं, जिससे भोजन व्यवस्था का स्वरूप बदल जाता है।
सिर्फ खाना नहीं, निगरानी भी है बड़ी चुनौती
कूनो में चीता संरक्षण केवल भोजन उपलब्ध कराने तक सीमित नहीं है। इनके लिए ट्रैकिंग टीम, पशु चिकित्सक, रेडियो कॉलर मॉनिटरिंग, रेस्क्यू स्टाफ, गश्ती दल और विशेष प्रबंधन व्यवस्था लगातार काम करती है। यानी किसी चीते की सुरक्षा की वास्तविक लागत केवल उसके भोजन से कहीं अधिक होती है। भोजन का खर्च तो उस बड़े संरक्षण तंत्र का सिर्फ एक हिस्सा है, जो चीता प्रोजेक्ट (Project Cheetah) को जमीन पर सफल बनाने की कोशिश कर रहा है।

क्यों महत्वपूर्ण है यह निवेश?
भारत में चीता 1952 में आधिकारिक रूप से विलुप्त घोषित हो गया था। सात दशक बाद चीता प्रोजेक्ट के जरिए उसकी वापसी हुई। ऐसे में यह सिर्फ एक वन्यजीव परियोजना नहीं, बल्कि देश के संरक्षण इतिहास का सबसे बड़ा पुनर्स्थापन अभियान माना जा रहा है। कूनो में खर्च हो रही राशि को केवल एक आंकड़े के रूप में नहीं, बल्कि उस प्रयास के रूप में देखना चाहिए जिसके जरिए भारत अपनी खोई हुई जैव विविधता को वापस लाने की कोशिश कर रहा है। कूनो के एक चीते के भोजन पर औसतन करीब 1,000 रुपये प्रतिदिन खर्च होते हैं। लेकिन असली खर्च इस रकम से कहीं बड़ी है। यह खर्च उस महत्वाकांक्षी संरक्षण अभियान का हिस्सा है, जो भारत में चीतों की स्थायी और सुरक्षित वापसी सुनिश्चित करने की कोशिश कर रहा है।


