कैबिनेट ने 'पब्लिक एग्ज़ामिनेशन्स संशोधन बिल 2026' को मंजूरी दी। इसमें पेपर लीक के लिए 10 साल तक की जेल, ₹10 करोड़ का जुर्माना, स्पेशल फास्ट-ट्रैक कोर्ट और 6 बड़े बदलावों का प्रस्ताव चर्चा में है।
नई दिल्ली: देश में प्रतियोगी परीक्षाओं की साख पर लगे बट्टे और चौतरफा सियासी दबाव के बीच मोदी सरकार एक ऐसा मास्टरस्ट्रोक लेकर आई है, जिसने परीक्षा माफियाओं की रातों की नींद उड़ा दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट की बैठक में 'पब्लिक एग्ज़ामिनेशन्स (अनुचित साधनों की रोकथाम) संशोधन बिल, 2026' को आधिकारिक मंजूरी दे दी गई है। सोमवार को लोकसभा में पेश होने जा रहे इस प्रस्तावित कानून का सीधा मकसद है-पेपर लीक के सिंडिकेट को नेस्तनाबूद करना। लेकिन क्या यह नया चक्रव्यूह परीक्षा माफियाओं को रोक पाएगा, या फिर संसद में एक नए बड़े सियासी टकराव की वजह बनेगा?
प्रधानमंत्री का कड़ा निर्देश: सोमवार को संसद में पेश होगा 'ब्रह्मास्त्र'
सूत्रों के मुताबिक, कैबिनेट बैठक के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बिल की गंभीरता को देखते हुए इसे सर्वोच्च प्राथमिकता देने का निर्देश दिया है। सरकार इस कानून को बिना किसी देरी के तुरंत लागू करना चाहती है। पिछले कुछ समय से परीक्षाओं में हुई धांधली को लेकर जो राजनीतिक गतिरोध बना हुआ था, यह बिल उसका एक सख्त कानूनी जवाब माना जा रहा है। वीकेंड की छुट्टी के बाद जब सोमवार को संसद की कार्यवाही शुरू होगी, तो यह बिल पटल पर रखा जाएगा, जिससे सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच एक बार फिर तीखी बहस होने की पूरी संभावना है।
नए एग्ज़ाम बिल में 6 बड़े बदलाव: एक नजर में पूरा कानून
मौजूदा 2024 के कानून को बेहद कड़ा और धारदार बनाने के लिए इस संशोधन विधेयक में मुख्य रूप से 6 बड़े बदलावों का प्रस्ताव रखा गया है, जो सीरियल वाइज नीचे दिए गए हैं:
- 1. सजा दोगुनी, जुर्माना भी कई गुना बढ़ेगा: इस नए संशोधन के तहत सामान्य परीक्षा कदाचार (धोखाधड़ी) के लिए न्यूनतम सजा को 3 साल से बढ़ाकर सीधे 5 साल कर दिया गया है। वहीं, अधिकतम सजा को 5 साल से बढ़ाकर 10 साल की कठोर जेल में बदल दिया गया है। इसके अलावा, अधिकतम जुर्माने की राशि को भी ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹50 लाख कर दिया गया है।
- 2. सर्विस प्रोवाइडर्स पर ₹5 करोड़ का जुर्माना और 8 साल का बैन: परीक्षा आयोजित कराने वाली जो भी बाहरी एजेंसियां या सर्विस प्रोवाइडर्स इस धांधली में शामिल पाए जाएंगे, उन पर ₹5 करोड़ तक का भारी-भरकम जुर्माना लगाया जा सकेगा। इतना ही नहीं, ब्लैकलिस्ट करने की अवधि को भी मौजूदा 4 साल से बढ़ाकर 8 साल कर दिया गया है, यानी वे 8 साल तक कोई सरकारी परीक्षा आयोजित नहीं कर पाएंगे।
- 3. सीनियर मैनेजमेंट को सीधे जेल की कोठरी: अगर कोई सर्विस प्रोवाइडर कंपनी परीक्षा घोटाले में संलिप्त पाई जाती है, तो केवल कंपनी पर जुर्माना नहीं लगेगा। कंपनी के डायरेक्टर्स, पार्टनर्स और सीनियर मैनेजमेंट के अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से दोषी माना जाएगा। उन्हें न्यूनतम 5 साल की जेल और ₹5 करोड़ तक का व्यक्तिगत जुर्माना भुगतना होगा।
- 4. ऑर्गनाइज़्ड फ्रॉड (संगठित माफिया) के लिए 10 करोड़ का हर्जाना: यदि पेपर लीक किसी संगठित संस्थागत नेटवर्क या सिंडिकेट (Organised Exam Fraud) द्वारा किया जाता है, तो कानून और भी भयानक रूप ले लेगा। ऐसे मामलों में शामिल अपराधियों को कम से कम 7 साल से लेकर 10 साल तक की कठोर जेल और न्यूनतम ₹10 करोड़ का भारी जुर्माना देना होगा।
- 5. 2 महीने के भीतर जांच पूरी करने की समय-सीमा: जांच में होने वाली ढिलाई को खत्म करने के लिए इस बिल में सख्त टाइमलाइन तय की गई है। केंद्र सरकार को मामलों को केंद्रीय जांच एजेंसी को सौंपने या एक स्पेशल टास्क फोर्स (STF) बनाने का अधिकार दिया गया है। इस कानून के तहत किसी भी हाल में 2 महीने के भीतर पूरी जांच समाप्त करनी होगी।
- 6. स्पेशल फास्ट-ट्रैक कोर्ट और रोज़ाना सुनवाई: अपराधियों को तुरंत सजा दिलाने के लिए हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में स्पेशल फास्ट-ट्रैक कोर्ट बनाए जाएंगे। इन अदालतों में मुकदमों की सुनवाई रोजाना (डे-टू-डे) होगी और चार्जशीट दाखिल होने के महज 3 महीने के भीतर ट्रायल पूरा कर फैसला सुनाना होगा। पुराने चल रहे मामले भी इन्हीं अदालतों में ट्रांसफर किए जाएंगे।
सरकार का दावा-परीक्षा प्रणाली होगी और मजबूत
विधेयक के साथ जारी 'उद्देश्य और कारण' के बयान में कहा गया है कि इन संशोधनों का मकसद सार्वजनिक परीक्षाओं की निष्पक्षता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को मजबूत करना है। सरकार का मानना है कि समयबद्ध जांच, तेज सुनवाई और कड़ी सजा से परीक्षा माफिया पर प्रभावी अंकुश लगाया जा सकेगा।
क्या थम जाएगा गतिरोध या बढ़ेगी विपक्ष की तल्खी?
इस विधेयक में यह भी प्रावधान है कि स्पेशल फास्ट-ट्रैक कोर्ट के फैसलों के खिलाफ अपील सीधे हाई कोर्ट की डिवीज़न बेंच में होगी, जिसे तीन महीने के भीतर निपटाना होगा। सरकार का दावा है कि इन ऐतिहासिक बदलावों से परीक्षाओं में पारदर्शिता और विश्वसनीयता वापस लौटेगी। लेकिन सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि परीक्षा सुधारों को लेकर पहले से ही हमलावर विपक्षी दल संसद में इस सख्त कानून का समर्थन करेंगे, या इसे सरकार की एक और रणनीतिक ढाल बताकर सदन की कार्यवाही को दोबारा ठप कर देंगे। नजरें सोमवार को लोकसभा की कार्यवाही पर टिकी हैं।


