पंजाब बिजली संकट गहराया! 6 पावर प्लांट बंद होने के बाद उत्पादन घटा, किसानों-उद्योगों पर खतरा, PSPCL महंगी बिजली खरीदने को मजबूर, किसानों, उद्योगों और अर्थव्यवस्था पर असर बढ़ा, आखिर जिम्मेदार कौन?
चंडीगढ़: दशकों तक भारत की 'हरित क्रांति' (Green Revolution) का नेतृत्व करने वाला और पूरे देश का पेट भरने वाला पंजाब आज खुद एक अभूतपूर्व और ऐतिहासिक संकट के मुहाने पर खड़ा है। राज्य का सबसे बड़ा विकास-इंजन यानी उसकी बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। भीषण गर्मी और धान की रोपाई के इस सबसे महत्वपूर्ण सीजन में, जब किसानों को चौबीसों घंटे बिजली की जरूरत है, तब पंजाब का पावर ग्रिड पूरी तरह हांफ रहा है। यह कोई सामान्य तकनीकी खराबी नहीं है, बल्कि यह सालों से नजरअंदाज किए जा रहे सिस्टम की एक ऐसी विफलता (Systematic Failure) है जिसने उद्योगों से लेकर खेतों तक, हर तरफ हाहाकार मचा दिया है।

अर्श पर डिमांड, फर्श पर सप्लाई: जब एक साथ बैठ गईं 6 थर्मल यूनिट्स!
पंजाब की बिजली व्यवस्था को सबसे बड़ा और घातक झटका तब लगा, जब राज्य संचालित ताप विद्युत संयंत्रों (Thermal Power Plants) की 6 बड़ी इकाइयां एक साथ अचानक ठप (Out of Service) हो गईं। इससे राज्य की कुल बिजली उत्पादन क्षमता में सीधे 1,800 मेगावाट से अधिक की भारी गिरावट आ गई।
10 रुपये प्रति यूनिट का वो 'महंगा' सच
इस ऐतिहासिक कमी को पूरा करने के लिए पंजाब स्टेट पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (PSPCL) को राष्ट्रीय बिजली एक्सचेंज से इमरजेंसी में बिजली खरीदनी पड़ी। ग्रिड को क्रैश होने से बचाने के लिए निगम को कुछ मौकों पर 10 रुपये प्रति यूनिट जैसी अत्यधिक और रिकॉर्ड तोड़ महंगी दरों पर बिजली खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ा, जिसने पहले से ही कर्ज में डूबे निगम की वित्तीय कमर तोड़ कर रख दी है।
लेहरा मोहब्बत का वो 'रहस्यमयी संकट' जिसने बुझा दिए दीये
इस पूरे पावर क्राइसिस का सबसे बड़ा केंद्र बना लेहरा मोहब्बत स्थित 920 मेगावाट क्षमता वाला गुरु हरगोबिंद थर्मल प्लांट। राज्य के इस सबसे भरोसेमंद और बड़े सरकारी कारखाने की चारों इकाइयां एक साथ अचानक बंद हो गईं। सरकारी रिपोर्टों में इसके पीछे 'फ्लाई ऐश' (राख) का अत्यधिक जमाव और गंभीर तकनीकी गड़बड़ी बताई गई। लेकिन कहानी सिर्फ मशीनों के खराब होने की नहीं है। केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के नियमों के अनुसार, इन सब-क्रिटिकल पावर प्लांट्स की उम्र 25 वर्ष होती है, जबकि रोपड़ जैसी कई इकाइयां 30 साल से ज्यादा समय से बिना किसी बड़े आधुनिकीकरण के घिसट रही थीं। पूर्ववर्ती सरकारों की सुस्ती और वर्तमान परिचालन संबंधी चूक का नतीजा आज पूरा पंजाब भुगत रहा है। ऊपर से, लगभग 1,852 आउटसोर्स कर्मचारियों की नियमितीकरण को लेकर चल रही हड़ताल ने आग में घी का काम किया और मरम्मत का काम पूरी तरह ठप हो गया।
पंजाब बनाम हरियाणा: एक साथ सफर शुरू करने वाले दो पड़ोसी, फिर यह फासला क्यों?
इस संकट ने पंजाब के नीति-निर्माताओं के सामने एक बेहद असहज और कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है। भौगोलिक और सामाजिक रूप से समान परिस्थितियों वाले पड़ोसी राज्य हरियाणा के मुकाबले पंजाब पिछड़ता नजर आ रहा है। जहां पंजाब हर गर्मी में सिर्फ संकट प्रबंधन में अपनी पूरी प्रशासनिक ऊर्जा खपा देता है, वहीं हरियाणा ने अपने ट्रांसमिशन नेटवर्क को मजबूत कर गुरुग्राम, फरीदाबाद और पानीपत जैसे बड़े औद्योगिक हब खड़े कर दिए।
पीआईबी (PIB) के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, यह अंतर सिर्फ बिजली का नहीं बल्कि सीधे आर्थिक संपन्नता का है:
| राज्य प्रति व्यक्ति | नेट स्टेट डोमेस्टिक प्रोडक्ट (NSDP - 2022-23) |
| पंजाब | 1,73,873 रुपये |
| हरियाणा | 2,96,685 रुपये |
यह चौंकाने वाला अंतर साफ साबित करता है कि बिजली सिर्फ घरों को रोशन करने के लिए नहीं, बल्कि रोजगार, प्रति व्यक्ति आय और औद्योगिक क्रांति की असली रीढ़ होती है।
धान की खेती पर मंडराया संकट
यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब पंजाब में धान की रोपाई अपने सबसे महत्वपूर्ण दौर में है। किसानों के लिए सिंचाई पूरी तरह बिजली पर निर्भर है। कई जिलों से अनियमित बिजली आपूर्ति और कटौती की शिकायतें सामने आईं। यदि बिजली संकट लंबा खिंचता है, तो इसका सीधा असर फसल उत्पादन, भूजल सिंचाई और किसानों की आय पर पड़ सकता है।
क्या राजनीतिक दावों और चुनावी वादों की भेंट चढ़ गई देवभूमि?
वर्तमान आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार पंजाब में बेहतर प्रशासन, कुशल प्रबंधन और 24 घंटे निर्बाध बिजली के बड़े वादे के साथ सत्ता में आई थी। हालांकि यह सच है कि जर्जर बुनियादी ढांचा और घाटे में डूबा विभाग उन्हें विरासत में मिला है, लेकिन 4 साल के कार्यकाल के बाद आज जनता सीधे जवाबदेही मांग रही है। उद्योगपति महंगी बिजली और ट्रिपिंग से परेशान होकर दूसरे राज्यों का रुख करने की सोच रहे हैं, एमएसएमई (MSMEs) बंद होने की कगार पर हैं और किसान खेतों में सूखती फसलों को देखकर खून के आंसू रो रहे हैं। आगामी चुनावों में यह बिजली संकट महज एक राजनीतिक मुद्दा नहीं, बल्कि सत्ता की चाबी तय करने वाला सबसे बड़ा फैक्टर बनने जा रहा है।
क्या केवल मौजूदा सरकार जिम्मेदार है?
बिजली संकट का राजनीतिक पहलू भी चर्चा में है। मौजूदा आम आदमी पार्टी सरकार पर संचालन और प्रबंधन की जिम्मेदारी जरूर है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह संकट कई वर्षों से चली आ रही संरचनात्मक कमियों का परिणाम भी है। पूर्ववर्ती सरकारों के दौरान पुराने संयंत्रों के आधुनिकीकरण, वित्तीय सुधार और बुनियादी ढांचे में अपेक्षित निवेश नहीं हो सका। वहीं वर्तमान सरकार से अपेक्षा थी कि वह प्रशासनिक दक्षता और बेहतर प्रबंधन के जरिए हालात सुधारेगी।
क्या पंजाब फिर बनेगा ऊर्जा और विकास का केंद्र?
आज पंजाब के सामने चुनौती केवल गर्मियों में बिजली उपलब्ध कराने की नहीं है, बल्कि पूरे ऊर्जा ढांचे को आधुनिक और टिकाऊ बनाने की है। यदि समय रहते पुराने संयंत्रों का आधुनिकीकरण, ट्रांसमिशन नेटवर्क का विस्तार, वित्तीय सुधार और मानव संसाधनों का बेहतर प्रबंधन नहीं किया गया, तो बिजली संकट राज्य की कृषि, उद्योग और आर्थिक विकास तीनों पर दीर्घकालिक असर डाल सकता है। आने वाले समय में यह मुद्दा केवल बिजली का नहीं, बल्कि पंजाब के भविष्य और उसके विकास मॉडल की सबसे बड़ी परीक्षा बन सकता है।


