Congress organisation: NEET पेपर लीक पर CJP के आंदोलन और Dharmendra Pradhan के इस्तीफे के बाद Rahul Gandhi ने “Chhatron Ki Goonj” से Gen Z तक पहुंच बनाई, पर DUSU में NSUI चारों पद हार गई. ABVP ने 3 जीते, VP Deepanshu Shokeen बने. BJP के बूथ ढांचे के मुकाबले Congress के संगठन की कमी फिर सामने आई.

Dharmendra Pradhan Resignation: NEET-UG पेपर लीक विवाद ने 2026 में छात्रों और युवाओं के मुद्दों को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। सोशल मीडिया से उभरे ‘Cockroach Janata Party’ (CJP) जैसे छात्र-युवा समूहों के विरोध ने शिक्षा व्यवस्था, परीक्षा में गड़बड़ी और जवाबदेही को लेकर बहस तेज की। इस आंदोलन के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने 25 जुलाई 2026 को इस्तीफा दिया। विरोध प्रदर्शनों में उनके इस्तीफे की मांग प्रमुख मुद्दों में शामिल थी।

इसी पृष्ठभूमि में कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने ‘छात्रों की गूंज’ अभियान के जरिए पेपर लीक, परीक्षा व्यवस्था, महंगी शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को उठाया। जून 2026 में शुरू हुए इस अभियान में छात्रों से अपनी समस्याएं और सुझाव साझा करने तथा याचिका पर हस्ताक्षर करने की अपील की गई।

लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय छात्रसंघ यानी DUSU के नतीजों ने बहस को एक अलग दिशा दे दी। सवाल अब केवल यह नहीं रहा कि कौन-सा मुद्दा युवाओं के बीच लोकप्रिय है, बल्कि यह भी है कि किसी राजनीतिक संदेश को जमीन पर संगठन और चुनावी समर्थन में बदलने की क्षमता किसके पास है।

DUSU नतीजों में क्या रहा खास?

19 सितंबर को घोषित DUSU चुनाव परिणामों में ABVP ने चार केंद्रीय पदों में से तीन पर जीत दर्ज की। यश डबास अध्यक्ष, रिया छाबड़ी सचिव और लक्ष्य राज सिंह संयुक्त सचिव चुने गए। उपाध्यक्ष पद निर्दलीय उम्मीदवार दीपांशु शौकीन ने जीता, जो पहले NSUI से जुड़े रहे थे।

अध्यक्ष पद पर यश डबास को 24,576 वोट मिले, जबकि NSUI के विजय शंकर मीणा को 22,523 वोट मिले। यानी दोनों के बीच 2,053 वोटों का अंतर रहा। उपाध्यक्ष पद पर दीपांशु शौकीन को 30,615 वोट मिले। इस चुनाव में मतदान प्रतिशत 40.46 रहा।

DUSU का नतीजा पूरे देश के Gen Z मतदाताओं की पसंद का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। दिल्ली विश्वविद्यालय का चुनाव एक विशिष्ट कैंपस, मतदाता समूह और स्थानीय संगठनात्मक परिस्थितियों में होता है। फिर भी यह नतीजा छात्र राजनीति में जमीनी संगठन की भूमिका पर चर्चा जरूर खोलता है।

कांग्रेस के सामने संगठन का सवाल क्यों?

2024 लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने 99 सीटें जीतीं, जो 2019 की 52 सीटों की तुलना में सुधार था। इसके बाद भी अलग-अलग राज्यों के विधानसभा चुनावों में पार्टी के प्रदर्शन और संगठन को लेकर बहस जारी रही।

कांग्रेस के भीतर भी संगठन को मजबूत करने की जरूरत पर चर्चा होती रही है। पार्टी के सामने चुनौती यह रही है कि राष्ट्रीय स्तर पर उठाए गए मुद्दों और नेताओं की लोकप्रियता को राज्य, जिला, विधानसभा और बूथ स्तर पर लगातार सक्रिय संगठन में कैसे बदला जाए।

DUSU का चुनाव इसी अंतर को समझने का एक छोटा उदाहरण हो सकता है। यहां राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श के साथ-साथ उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पहुंच, कैंपस के स्थानीय मुद्दे, छात्र संगठनों की मौजूदगी और मतदान दिवस की संगठनात्मक क्षमता भी भूमिका निभाती है।

BJP-ABVP मॉडल में बूथ से कैंपस तक संगठन

BJP के संगठनात्मक ढांचे में बूथ स्तर तक समितियों और कार्यकर्ताओं की संरचना लंबे समय से चर्चा का विषय रही है। 2026 की शुरुआत में पार्टी के संगठन पर्व से जुड़े आंकड़ों के मुताबिक 10.70 लाख से ज्यादा बूथों में करीब 7.88 लाख बूथ अध्यक्षों का चुनाव पूरा हो चुका था और लगभग 89.48 लाख बूथ समिति सदस्य गठित किए जा चुके थे।

ABVP के मामले में भी कैंपस स्तर पर लगातार सक्रिय छात्र संगठन एक महत्वपूर्ण संरचनात्मक आधार है। हालांकि DUSU परिणाम को सीधे BJP के राष्ट्रीय चुनावी संगठन का प्रमाण मानना उचित नहीं होगा, लेकिन छात्र राजनीति में लगातार मौजूदगी और संगठनात्मक नेटवर्क की भूमिका को इससे अलग करके भी नहीं देखा जा सकता।

कांग्रेस की चुनौती: संदेश से संगठन तक

कांग्रेस ने भी संगठन को मजबूत करने की दिशा में कदम उठाए हैं। ऐसे प्रयासों का उद्देश्य जिला समितियों को सक्रिय करना और बूथ स्तर तक पार्टी की मौजूदगी बढ़ाना है। पंजाब में ‘booth sevaks’ जैसे प्रयोगों के जरिए मतदाता सूची के स्तर तक जिम्मेदारी तय करने की कोशिश भी सामने आई है।

ऐसे में DUSU का परिणाम राहुल गांधी के ‘छात्रों की गूंज’ अभियान की सफलता या असफलता का सीधा पैमाना नहीं है। दोनों अलग-अलग स्तर की राजनीतिक गतिविधियां हैं। लेकिन यह नतीजा एक अहम सवाल जरूर सामने रखता है—क्या किसी मुद्दे पर युवाओं के बीच चर्चा पैदा करना और उस ऊर्जा को स्थायी संगठनात्मक नेटवर्क में बदलना एक ही प्रक्रिया है?

आखिरकार, छात्र राजनीति से राष्ट्रीय राजनीति तक पहुंचने के लिए मुद्दे, नेतृत्व, स्थानीय जुड़ाव और संगठन—इन सभी की अपनी भूमिका होती है। DUSU परिणाम ने इसी बहस को एक बार फिर सामने ला दिया है।