सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में 5 रिटायर्ड जजों को एड-हॉक जज नियुक्त किया है। अनुच्छेद 224A के तहत यह नियुक्ति 2 साल के लिए है। इसका मुख्य उद्देश्य हाईकोर्ट में बड़ी संख्या में लंबित मामलों का निपटारा करना है।
इलाहाबाद: सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने एक असाधारण कदम उठाया है। कॉलेजियम ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में रिटायर्ड जजों को एड-हॉक जज के रूप में नियुक्त किया है। पांच रिटायर्ड जजों को एड-हॉक जज के रूप में नियुक्त करने का फैसला किया गया है। यह कार्रवाई संविधान के अनुच्छेद 224ए का इस्तेमाल करके की गई है, जो रिटायर्ड जजों को अस्थायी रूप से हाईकोर्ट में फिर से नियुक्त करने की इजाजत देता है। यह प्रावधान तब इस्तेमाल किया जाता है जब जजों के पद खाली हों।
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने मंगलवार को दो साल के लिए अस्थायी जजों के रूप में नियुक्ति को मंजूरी दी। कॉलेजियम ने जस्टिस मोहम्मद फैज आलम खान, जस्टिस मोहम्मद असलम, जस्टिस सैयद आफताब हुसैन रिजवी, जस्टिस रेनू अग्रवाल और जस्टिस ज्योत्सना शर्मा को अस्थायी जज के रूप में नियुक्त करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी।
लंबित मामलों को निपटाने की कोशिश
कॉलेजियम का कहना है कि ये नियुक्तियां इलाहाबाद हाईकोर्ट के कामकाज को मजबूत करने के लिए हैं, जो लंबित मामलों के कारण बड़े संकट का सामना कर रहा है। संविधान का अनुच्छेद 224-ए हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, किसी रिटायर्ड जज से अस्थायी जज के रूप में काम करने का अनुरोध करने का अधिकार देता है। ऐसी नियुक्तियां आमतौर पर जजों की कमी को दूर करने और न्याय का कुशल प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए की जाती हैं।
अपने कार्यकाल के दौरान, अस्थायी जजों के पास हाईकोर्ट के स्थायी जजों के समान ही अधिकार क्षेत्र, शक्तियां और विशेषाधिकार होंगे। देश के सबसे बड़े हाईकोर्ट में से एक, इलाहाबाद हाईकोर्ट सालों से बड़ी संख्या में मामलों को संभाल रहा है। यहां कई मामले लंबित होने की शिकायतें थीं।
