UP पंचायत चुनाव पर सस्पेंस बरकरार, अप्रैल–मई में होंगे या टल जाएंगे चुनाव?
UP में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों पर सस्पेंस बना हुआ है। OBC आरक्षण और समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के गठन में देरी के चलते चुनाव टल सकते हैं। अप्रैल–मई में प्रस्तावित चुनाव अब कई महीनों आगे खिसकने की संभावना है।

UP पंचायत चुनाव पर सस्पेंस: तय समय पर होंगे या फिर टल जाएंगे चुनाव?
उत्तर प्रदेश में त्रिस्तरीय पंचायत चुनावों को लेकर राजनीतिक गलियारों में असमंजस की स्थिति बन गई है। अप्रैल–मई में प्रस्तावित ये चुनाव अब समय पर होंगे या फिर महीनों के लिए टल जाएंगे, इसे लेकर तस्वीर साफ नहीं है। हालात ऐसे बन चुके हैं कि अगले तीन–चार महीनों में चुनावी प्रक्रिया पूरी कर पाना बेहद मुश्किल नजर आ रहा है। इसी वजह से यह चर्चा तेज हो गई है कि पंचायत चुनाव कम से कम चार महीने और आगे खिसक सकते हैं।
पंचायत चुनाव भले ही आधिकारिक रूप से घोषित न हुए हों, लेकिन लगभग सभी राजनीतिक दल प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अपनी रणनीति तय कर चुके हैं। कई दलों ने तो अपनी प्लानिंग के मुताबिक जमीनी स्तर पर काम भी शुरू कर दिया है। ऐसे में चुनाव टलने की आशंका ने सियासी माहौल को और गरमा दिया है।
OBC आरक्षण बना सबसे बड़ी अड़चन
पंचायत चुनाव में देरी की सबसे बड़ी वजह अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) के लिए आरक्षित सीटों का अब तक तय न होना है। ओबीसी आरक्षण निर्धारण के लिए समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन अभी तक नहीं हो सका है। आयोग की रिपोर्ट के आधार पर ही आबादी के अनुपात में ओबीसी सीटें तय की जानी हैं। सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट मानक के अनुसार बिना आयोग की रिपोर्ट के ओबीसी आरक्षण लागू नहीं किया जा सकता। जब तक आयोग गठित नहीं होता और उसकी रिपोर्ट नहीं आती, तब तक चुनाव कराना कानूनी रूप से संभव नहीं है।
पंचायती राज विभाग की ओर से समर्पित पिछड़ा वर्ग आयोग के लिए छह सदस्यों के नाम का प्रस्ताव शासन को भेजा जा चुका है, जिस पर कैबिनेट बैठक में निर्णय होना है। हालांकि आयोग के गठन के बाद भी समस्या खत्म नहीं होती। सभी 75 जिलों में ओबीसी आबादी का सर्वे कराने में कम से कम छह महीने का समय लग सकता है। इसके बाद सीटों के निर्धारण और चुनावी प्रक्रिया में तीन से चार महीने और लगेंगे। ऐसे में चुनाव छह से सात महीने बाद ही संभव माने जा रहे हैं।
मंत्री के बयान से बढ़ी दुविधा
इस पूरे मामले में दुविधा तब और बढ़ गई, जब पंचायती राज मंत्री ओम प्रकाश राजभर ने बयान दिया कि पंचायत चुनाव समय पर, यानी अप्रैल–मई में ही होंगे। सवाल यह है कि इतने कम समय में आयोग का गठन, सर्वे और आरक्षण प्रक्रिया कैसे पूरी होगी। 2011 की जनगणना के आधार पर इस बार अनुसूचित जाति के लिए 20.70% और अनुसूचित जनजाति के लिए 0.57% सीटें तय हैं, लेकिन ओबीसी के लिए स्थिति स्पष्ट नहीं है, क्योंकि जनगणना में ओबीसी का अलग से आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
रैपिड सर्वे और 27% की सीमा
2015 के रैपिड सर्वे में ग्रामीण आबादी में ओबीसी की हिस्सेदारी 53.33% पाई गई थी। 2021 के पंचायत चुनाव में इसी आधार पर आरक्षण दिया गया था, लेकिन अब अधिकतम 27% आरक्षण सीमा लागू है। इसका मतलब यह है कि किसी भी ब्लॉक में ओबीसी आबादी इससे अधिक होने पर भी आरक्षण 27% से ज्यादा नहीं दिया जा सकता।
चुनावी तैयारी में जुटा निर्वाचन विभाग
एक तरफ सरकार स्तर पर आरक्षण को लेकर स्थिति साफ नहीं है, वहीं दूसरी तरफ राज्य निर्वाचन विभाग अपने स्तर पर चुनावी तैयारियों में जुट गया है। मतदाता सूची संशोधन का काम तेज कर दिया गया है। ऐसे में पंचायत चुनाव समय पर होंगे या टलेंगे, इसका फैसला आने वाले दिनों में सरकार के अगले कदमों पर निर्भर करेगा।
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