ईरान-अमेरिका के बीच जंग खत्म होने की राह पर है। समझौते के तहत होरमुज़ जलडमरूमध्य खुलेगा और अमेरिका प्रतिबंध हटाएगा। यूरेनियम भंडार और जब्त संपत्ति पर आगे बातचीत होगी।

तो आखिरकार, ईरान के साथ जंग खत्म होने की राह पर है। शुक्रवार को दोनों पक्षों ने इस समझौते की जानकारी दी। दुनिया जिस खबर का इंतज़ार कर रही थी, वो आ गई है - होरमुज़ जलडमरूमध्य फिर से खुलेगा। इसके बदले में अमेरिका ईरान पर लगे प्रतिबंध हटाएगा। आगे की बातचीत जिनेवा में होगी। हालांकि, इस समझौते के बाद भी होरमुज़ में कुछ झड़पें हुई हैं। CNN की रिपोर्ट है कि अमेरिका ने ईरान के यूरेनियम भंडार को ज़ब्त करने का एक सैन्य अभियान आखिरी पलों में रोक दिया। अब उस भंडार की सुरक्षा दोगुनी कर दी गई है। उसे बाहर निकालना जान जोखिम में डालने जैसा होगा, लेकिन अमेरिका की शर्त है कि उसे हर हाल में बाहर निकालना ही होगा।

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चोट अमेरिका को लगी, ईरान और मज़बूत हुआ

28 फरवरी को जब यह जंग शुरू हुई, तो शायद अमेरिका ने सोचा होगा कि यह जल्द ही खत्म हो जाएगी। लेकिन अपने बड़े नेताओं को खोने के बावजूद ईरान का शासन नहीं टूटा। शायद यहीं पर अमेरिका और इज़राइल का अंदाज़ा गलत साबित हुआ। जंग और तेज़ हो गई। होरमुज़ पर कब्ज़ा करके ईरान ने पूरी दुनिया को मुश्किल में डाल दिया। खाड़ी देशों को अमेरिका से दोस्ती की सज़ा मिली। ईरान की सरकार को तो वैसे भी अपनी जनता की परेशानियों से कभी ज़्यादा फर्क नहीं पड़ा। खमेनेई के बाद जो लोग सत्ता में आए, वे और भी ज़्यादा कट्टर निकले। IRGC भी पहले से ज़्यादा ताकतवर हो गई। इसका नतीजा यह हुआ कि जंग ने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था की कमर तोड़ दी। चेतावनियां और पाबंदियां आम हो गईं। जहाज़ों पर हमले हुए, जिसमें कुछ भारतीयों को भी अपनी जान गंवानी पड़ी। जब ईरान के सहयोगी हिजबुल्लाह ने इज़राइल पर हमला किया, तो इज़राइल ने लेबनान में जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। आखिर में, लेबनान ने भी ईरान से पल्ला झाड़ लिया और उसे दखल न देने की चेतावनी दी। यह ईरान के लिए एक बड़ा झटका था, भले ही उसने इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी।

होरमुज़ खुलेगा

पाकिस्तान की मध्यस्थता में ईरान और अमेरिका के बीच समझौते के लिए कई दौर की बातचीत हुई। लेकिन अब तक हर बार आखिरी मौके पर बात बिगड़ जाती थी। अप्रैल में सैद्धांतिक तौर पर युद्धविराम तो हो गया था, लेकिन तनाव खत्म नहीं हुआ। दुनिया को उम्मीद है कि इस बार ऐसा नहीं होगा। यह साफ था कि अमेरिका इस दलदल से बाहर निकलना चाहता था, लेकिन ईरान की शर्तें उसे मंजूर नहीं थीं, और यही हाल ईरान का भी था। अब जो समझौता हुआ है, उसमें सबसे अहम है होरमुज़ का खुलना। इसके बदले में अमेरिका, ईरान के चारों ओर लगाई गई अपनी नौसैनिक नाकेबंदी हटाएगा। ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराग्शी ने बताया है कि ईरान के अंदर कुछ लोग इसका विरोध कर रहे हैं और अभी अंतिम फैसला नहीं हुआ है, लेकिन अगर अस्थायी समझौते पर सहमति बनी तो दस्तखत हो जाएंगे। पाकिस्तान ने भी एक MOU (समझौता ज्ञापन) होने की पुष्टि की है। लेकिन इज़राइल इस समझौते का हिस्सा नहीं है। खबरें तो ये भी थीं कि इस बीच ट्रंप और नेतन्याहू के बीच कई बार गंभीर मतभेद और बहस हुई।

यूरेनियम का मुद्दा

खैर, होरमुज़ का खुलना और प्रतिबंधों का हटना तो जल्द ही होगा। इसके बाद बातचीत के लिए 60 दिनों का वक्त मिलेगा। असली मुद्दा यूरेनियम है। अमेरिकी अधिकारियों का कहना है कि इसे नष्ट करके ईरान से बाहर निकाला जाएगा। यह एक खतरनाक मिशन है और इसे कैसे अंजाम दिया जाएगा, यह अभी तय नहीं है। समझौते की खबर आने से ठीक पहले CNN ने रिपोर्ट दी थी कि अमेरिका इसे हटाने के लिए एक सैन्य कार्रवाई की तैयारी कर चुका था, लेकिन समझौते के बाद इसे रोक दिया गया।

ईरान की जब्त संपत्ति

ईरान की जब्त की गई संपत्ति को लौटाने पर फिलहाल कोई फैसला नहीं हुआ है। यह ईरान की सबसे बड़ी मांग थी। पिछले हफ्ते तक तो ईरान कह रहा था कि इसके बिना कोई बातचीत नहीं होगी। अब भी ईरान का कहना है कि संपत्ति वापस मिलेगी, जबकि अमेरिका इससे इनकार कर रहा है। इसके बदले ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था में फिर से शामिल किया जाएगा और प्रतिबंध हटाए जाएंगे। अधिकारियों का कहना है कि संपत्ति लौटाने का काम धीरे-धीरे, ईरान के बर्ताव को देखकर किया जाएगा। पहले भी कई बार बात यहां तक पहुंची थी, लेकिन आखिरी पलों में बिगड़ गई। पर इस बार सिर्फ अमेरिका और ईरान ही नहीं, बल्कि खाड़ी देश भी उम्मीद जता रहे हैं।

इज़राइल-ईरान

ईरान ने खुद कहा है कि इस MOU का एक मकसद इज़राइल-हिजबुल्लाह संघर्ष को भी सुलझाना है। यह भी एक अच्छी बात है। अगर ईरान कहेगा तो हिजबुल्लाह और हमास, दोनों हथियार डाल देंगे। अमेरिका और इज़राइल के खिलाफ ईरान का प्रॉक्सी वॉर (यानी दूसरों के कंधे पर रखकर बंदूक चलाना) खत्म होना चाहिए। भले ही पुराना 'ट्राइडेंट अलायंस' (Trident alliance - जिसमें इज़राइल, तुर्की और क्रांति से पहले का ईरान शामिल थे) फिर से न बने, लेकिन कम से कम दोनों पक्षों को एक-दूसरे के खात्मे का सपना देखना तो बंद करना ही होगा।

अगर सब कुछ MOU के मुताबिक हुआ, तो पश्चिम एशिया में शांति लौट सकती है। इसके बाद सिर्फ गाज़ा का मामला बचेगा। लेकिन क्या पता, इज़राइल-ईरान शांति शायद उस समस्या को सुलझाने का भी कोई रास्ता निकाल दे!