US buying Chagos Islands: चागोस द्वीपसमूह को लेकर अमेरिका के संभावित कदम की चर्चा क्यों हो रही है? चागोस द्वीपसमूह को लेकर अमेरिका के संभावित कदम की चर्चा क्यों हो रही है? अमेरिका ने इससे पहले किन प्रमुख क्षेत्रों को दूसरे देशों से खरीदा था और आखिरी बार ऐसा कब हुआ था?

Chagos Islands Controversy: दुनिया की महाशक्तियों के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के दौर में एक बार फिर जमीन और भू-राजनीति चर्चा के केंद्र में आ गई है। खबरें हैं कि अमेरिका हिंद महासागर में स्थित चागोस द्वीपसमूह को लेकर एक बड़ा कदम उठाने पर विचार कर रहा है। यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है और किसी समझौते तक पहुंचता है, तो करीब 109 साल बाद अमेरिका किसी दूसरे देश के क्षेत्र को खरीदने की दिशा में कदम बढ़ा सकता है। हालांकि अभी तक कोई अंतिम निर्णय नहीं हुआ है, लेकिन इस संभावित कदम ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति, सुरक्षा रणनीति और वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर नई बहस छेड़ दी है।

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क्या है चागोस द्वीपसमूह और क्यों है इतना महत्वपूर्ण?

चागोस द्वीपसमूह हिंद महासागर में स्थित एक रणनीतिक क्षेत्र है, जो वर्तमान में ब्रिटेन के नियंत्रण में है और ब्रिटिश ओवरसीज टेरिटरी माना जाता है। इस क्षेत्र का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा डिएगो गार्सिया द्वीप है, जहां अमेरिका और ब्रिटेन का संयुक्त सैन्य अड्डा मौजूद है। यह बेस एशिया, अफ्रीका और मध्य पूर्व के बीच स्थित होने के कारण अमेरिकी सैन्य अभियानों और निगरानी गतिविधियों के लिए बेहद अहम माना जाता है।

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अमेरिका पहले भी खरीद चुका है दूसरे देशों की जमीन

अमेरिका के इतिहास में दूसरे देशों से क्षेत्र खरीदने की कई बड़ी मिसालें मौजूद हैं।

  • 1803 में लुइसियाना खरीद : अमेरिका ने फ्रांस से लुइसियाना क्षेत्र खरीदा था। इस सौदे ने अमेरिकी भूभाग को लगभग दोगुना कर दिया और देश के विस्तार में बड़ी भूमिका निभाई।
  • 1867 में अलास्का का अधिग्रहण : रूस से अलास्का खरीदना अमेरिकी इतिहास के सबसे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक सौदों में गिना जाता है। बाद में यहां तेल, गैस और अन्य प्राकृतिक संसाधनों के विशाल भंडार मिले, जिससे यह सौदा बेहद लाभदायक साबित हुआ।
  • 1917 में आखिरी बड़ी खरीद : अमेरिका ने 1917 में डेनमार्क से डेनिश वेस्ट इंडीज खरीदा था। यही क्षेत्र आज अमेरिकी वर्जिन आइलैंड्स के नाम से जाना जाता है। इसके बाद अमेरिका ने किसी विदेशी क्षेत्र की सीधी खरीद नहीं की।

अब क्यों बदल गई दुनिया?

20वीं सदी के मध्य तक दुनिया की राजनीति में बड़े बदलाव आ चुके थे। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद संयुक्त राष्ट्र (UN) की स्थापना हुई और अंतरराष्ट्रीय कानूनों को अधिक महत्व मिलने लगा। आज किसी क्षेत्र का नियंत्रण बदलना केवल आर्थिक लेन-देन का मामला नहीं माना जाता। इसके लिए कानूनी समझौते, अंतरराष्ट्रीय संधियां और स्थानीय आबादी की इच्छा जैसे कई कारकों को महत्व दिया जाता है। यही वजह है कि किसी क्षेत्र को खरीदने की अवधारणा आज पहले की तुलना में कहीं अधिक जटिल हो चुकी है।

चागोस विवाद आखिर है क्या?

चागोस द्वीपसमूह लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवाद का विषय बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने पहले ब्रिटेन से कहा था कि वह इस क्षेत्र को मॉरीशस को सौंपने की प्रक्रिया पूरी करे। मॉरीशस लगातार दावा करता रहा है कि चागोस द्वीपसमूह उसका हिस्सा है। दूसरी ओर, अमेरिका और ब्रिटेन के लिए यहां मौजूद डिएगो गार्सिया सैन्य अड्डा रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी नीति-निर्माताओं को आशंका है कि यदि भविष्य में इस क्षेत्र पर किसी अन्य देश का प्रभाव बढ़ता है, तो हिंद महासागर में शक्ति संतुलन प्रभावित हो सकता है।

ट्रंप प्रशासन क्यों कर रहा है विचार?

रिपोर्ट्स के मुताबिक, डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन के कुछ रणनीतिक सलाहकार इस संभावना पर चर्चा कर रहे हैं कि क्या किसी समझौते के माध्यम से चागोस द्वीपसमूह का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है। ट्रंप पहले भी ग्रीनलैंड खरीदने की इच्छा जता चुके हैं। उनका मानना रहा है कि कुछ जटिल अंतरराष्ट्रीय विवादों को आर्थिक और कूटनीतिक समझौतों के जरिए हल किया जा सकता है। हालांकि चागोस को लेकर अभी तक कोई आधिकारिक निर्णय या औपचारिक प्रस्ताव सामने नहीं आया है।

चीन फैक्टर कितना महत्वपूर्ण?

विशेषज्ञों का मानना है कि हिंद महासागर में बढ़ती प्रतिस्पर्धा इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने समुद्री मार्गों, बंदरगाहों और रणनीतिक क्षेत्रों में अपनी मौजूदगी बढ़ाई है। ऐसे में अमेरिका हिंद महासागर में अपनी सैन्य और सामरिक स्थिति को कमजोर नहीं होने देना चाहता। डिएगो गार्सिया बेस इसी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है।

फिलहाल यह पूरा मामला चर्चा और रणनीतिक विचार-विमर्श के स्तर पर है। किसी भी संभावित सौदे के लिए ब्रिटेन, मॉरीशस, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और संबंधित पक्षों के बीच जटिल कानूनी और कूटनीतिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा। इसलिए निकट भविष्य में किसी त्वरित निर्णय की संभावना कम दिखाई देती है, लेकिन इस चर्चा ने एक बार फिर यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया है कि 21वीं सदी में भी क्या किसी देश की जमीन खरीदना संभव है?

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