US-Iran Peace Deal: अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते में कौन-कौन से प्रमुख बिंदु शामिल हैं? होर्मुज जलडमरूमध्य के खुलने से वैश्विक तेल बाजार और भारत पर क्या असर पड़ेगा? ईरान ने अंतिम समझौते को लेकर कौन सी शर्तें और चिंताएं जताई हैं?
पश्चिम एशिया पिछले कई महीनों से जिस तनाव और संघर्ष का केंद्र बना हुआ था, वहां अब शांति की एक नई उम्मीद दिखाई दे रही है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया है कि अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौता पूरा हो चुका है। इस घोषणा के बाद वैश्विक राजनीति, ऊर्जा बाजार और कूटनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्रुथ सोशल पर कहा कि ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो गया है और इसके तहत होर्मुज जलडमरूमध्य को फिर से खोला जाएगा। साथ ही अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी हटाने की भी बात कही गई है। यदि यह समझौता पूरी तरह लागू होता है तो इसका असर केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर दिखाई दे सकता है।
क्या है पूरा समझौता?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अनुसार दोनों देशों के बीच एक समझौते पर सहमति बन गई है और इसकी औपचारिक प्रक्रिया जल्द पूरी की जाएगी। समझौते के तहत सैन्य गतिविधियों को रोकने, समुद्री व्यापार को सामान्य बनाने और क्षेत्रीय तनाव कम करने पर जोर दिया गया है। हालांकि ईरान ने स्पष्ट किया है कि अंतिम समझौते पर अभी बातचीत बाकी है और अगले 60 दिनों के दौरान विभिन्न मुद्दों पर विस्तृत वार्ता होगी। तेहरान ने यह भी दोहराया है कि वह वॉशिंगटन पर पूरी तरह भरोसा नहीं करता और किसी भी समझौते के क्रियान्वयन पर नजर रखेगा।
होर्मुज जलडमरूमध्य क्यों है इतना महत्वपूर्ण?
दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री व्यापार मार्गों में शामिल होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। खाड़ी देशों से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचता है। पिछले कुछ महीनों के दौरान क्षेत्र में बढ़े तनाव और सैन्य गतिविधियों की वजह से वैश्विक ऊर्जा बाजार प्रभावित हुआ था। यदि यह मार्ग पूरी तरह खुलता है तो तेल और गैस की आपूर्ति में स्थिरता आने की उम्मीद बढ़ सकती है।
दुनिया भर से आने लगी प्रतिक्रियाएं
समझौते की घोषणा के बाद कई देशों और अंतरराष्ट्रीय नेताओं ने इसका स्वागत किया है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस समझ को सकारात्मक कदम बताते हुए उम्मीद जताई कि इससे पश्चिम एशिया में शांति और स्थिरता बहाल होगी। यूरोपीय संघ, तुर्किये, जापान और कई अन्य देशों ने भी कूटनीतिक प्रयासों की सराहना की है। वहीं इजराइल की ओर से समझौते को लेकर चिंता जताई गई है और कुछ नेताओं ने इसे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए चुनौती बताया है।
परमाणु कार्यक्रम और प्रतिबंध बने रहेंगे अहम मुद्दे
हालांकि शांति समझौते की घोषणा हो चुकी है, लेकिन ईरान के परमाणु कार्यक्रम और उस पर लगे आर्थिक प्रतिबंध अभी भी सबसे बड़े मुद्दों में शामिल हैं। यूरोपीय देशों ने कहा है कि यदि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को लेकर पारदर्शी और सत्यापन योग्य कदम उठाता है तो प्रतिबंधों में राहत देने पर विचार किया जा सकता है। दूसरी ओर ईरान की जमी हुई संपत्तियों को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच मतभेद बने हुए हैं।
क्या सचमुच खत्म हो जाएगा संघर्ष?
विशेषज्ञों का मानना है कि समझौते की घोषणा एक सकारात्मक शुरुआत जरूर है, लेकिन असली परीक्षा इसके क्रियान्वयन में होगी। पिछले वर्षों में भी कई बार अमेरिका और ईरान के बीच समझौते हुए, लेकिन राजनीतिक मतभेद और क्षेत्रीय घटनाक्रमों ने उन्हें कमजोर कर दिया। इसी वजह से आने वाले 60 दिन बेहद अहम माने जा रहे हैं। इसी अवधि में यह तय होगा कि दोनों देश स्थायी शांति की दिशा में आगे बढ़ते हैं या फिर पुराने विवाद एक बार फिर तनाव को जन्म देते हैं।
वैश्विक अर्थव्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?
यदि समझौता सफल रहता है और होर्मुज जलडमरूमध्य पूरी तरह सामान्य रूप से संचालित होने लगता है, तो अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में राहत देखने को मिल सकती है। इससे ऊर्जा कीमतों पर दबाव कम होगा और कई देशों की अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंच सकता है। दुनिया की नजर अब इस बात पर टिकी है कि अमेरिका और ईरान के बीच हुआ यह समझौता कागजों से निकलकर जमीन पर कितना सफल साबित होता है।


