US And Iran War Peace Talks Latest Update: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध रोकने को लेकर बातचीत तेज हो गई है। 14 पॉइंट प्रस्ताव, यूरेनियम संवर्धन, होर्मुज स्ट्रेट और प्रतिबंधों को लेकर दोनों देशों में बड़ा टकराव बना हुआ है। जानिए पूरा मामला और समझौता क्यों अटका है।
मध्य पूर्व में महीनों से जारी तनाव के बीच अब दुनिया की नजर अमेरिका और ईरान के बीच चल रही कूटनीतिक बातचीत पर टिक गई है। दोनों देशों के बीच युद्ध रोकने को लेकर बातचीत आगे बढ़ रही है, लेकिन अभी तक कोई अंतिम समझौता नहीं हो पाया है। अमेरिका ने ईरान को 6 मई को 14 पॉइंट वाला एक विस्तृत प्रस्ताव भेजा, जिसमें युद्धविराम से लेकर परमाणु कार्यक्रम और होर्मुज स्ट्रेट तक कई संवेदनशील मुद्दों को शामिल किया गया है।

हालांकि वॉशिंगटन को उम्मीद थी कि तेहरान 8 मई तक जवाब दे देगा, लेकिन ईरान ने साफ कर दिया है कि वह किसी भी फैसले में जल्दबाजी नहीं करेगा। ईरानी नेतृत्व का कहना है कि प्रस्ताव के हर शब्द और शर्त का बारीकी से अध्ययन किया जा रहा है और केवल “न्यायपूर्ण और संतुलित” समझौते को ही स्वीकार किया जाएगा।
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अमेरिका के 14 पॉइंट प्रस्ताव में क्या है?
अमेरिका द्वारा भेजे गए एक पेज के प्रस्ताव में सबसे बड़ी शर्त ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर रखी गई है। प्रस्ताव के अनुसार, ईरान को कम से कम 12 साल तक यूरेनियम संवर्धन रोकना होगा। इसके अलावा उसके पास मौजूद लगभग 440 किलो 60 प्रतिशत संवर्धित यूरेनियम को किसी तीसरे देश को सौंपने की मांग की गई है।
अमेरिका का तर्क है कि अगर संवर्धन का स्तर 90 प्रतिशत तक पहुंचता है तो उससे परमाणु हथियार बनाए जा सकते हैं। यही वजह है कि वॉशिंगटन इस मुद्दे पर किसी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं दिख रहा। इसके साथ ही प्रस्ताव में होर्मुज स्ट्रेट को 30 दिनों के भीतर पूरी तरह खोलने की मांग भी शामिल है। यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति के लिहाज से बेहद अहम माना जाता है, क्योंकि दुनिया के करीब 20 प्रतिशत तेल और गैस की सप्लाई इसी रास्ते से गुजरती है। बदले में अमेरिका कुछ पुराने आर्थिक प्रतिबंध हटाने, ईरान की फ्रीज की गई संपत्तियां लौटाने और आर्थिक राहत देने का संकेत दे चुका है।
ईरान जवाब देने में देरी क्यों कर रहा है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी प्रस्ताव की भाषा काफी तकनीकी और कानूनी है। ईरानी अधिकारी दस्तावेज की हर तारीख, हर शर्त और हर शब्द की गहन समीक्षा कर रहे हैं। ईरान की राजनीतिक व्यवस्था में कई शक्ति केंद्र मौजूद हैं और अंतिम निर्णय लेने से पहले सभी संस्थाओं की सहमति जरूरी मानी जाती है। सबसे अहम भूमिका सुप्रीम लीडर मुज्तबा खामेनेई की मानी जा रही है। माना जा रहा है कि उनकी मंजूरी के बिना अमेरिका को कोई औपचारिक जवाब नहीं भेजा जाएगा।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि ईरान दुनिया को यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी दबाव में झुककर फैसला नहीं करेगा। दूसरी तरफ अमेरिकी प्रशासन तेजी से डील फाइनल करना चाहता है। अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump और विदेश मंत्री Marco Rubio की ओर से लगातार आ रहे बयानों से भी यह साफ झलक रहा है कि वॉशिंगटन जल्द परिणाम चाहता है।
ईरान की अपनी क्या मांगें हैं?
ईरान ने भी बातचीत के लिए अपनी शर्तें सामने रखी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, तेहरान तीन चरणों वाले फार्मूले पर काम कर रहा है। पहला चरण 30 दिनों तक चल सकता है, जिसमें हर मोर्चे पर स्थायी युद्धविराम सुनिश्चित करने की कोशिश होगी। ईरान चाहता है कि केवल उसके खिलाफ सैन्य कार्रवाई ही न रुके, बल्कि लेबनान में हिज्बुल्लाह जैसे सहयोगी समूहों पर होने वाले हमले भी बंद हों। यही वह बिंदु है जहां अमेरिका के लिए गारंटी देना मुश्किल माना जा रहा है। तेहरान की सबसे बड़ी मांग यह है कि भविष्य में उसके खिलाफ दोबारा हमला न हो और इसकी अंतरराष्ट्रीय गारंटी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद दे। इसके अलावा ईरान सभी आर्थिक प्रतिबंध हटाने, फ्रीज संपत्तियां लौटाने और अमेरिकी नाकेबंदी खत्म करने की मांग पर भी अड़ा हुआ है।
होर्मुज स्ट्रेट क्यों बना सबसे बड़ा विवाद?
पूरी बातचीत में सबसे संवेदनशील मुद्दा होर्मुज स्ट्रेट और परमाणु कार्यक्रम को लेकर बना हुआ है। अमेरिका चाहता है कि ईरान इस रणनीतिक समुद्री रास्ते पर अपने नियंत्रण संबंधी दावों को कमजोर करे, ताकि वैश्विक तेल आपूर्ति सुरक्षित बनी रहे। लेकिन ईरान इसे अपनी सामरिक ताकत और क्षेत्रीय प्रभाव का अहम हिस्सा मानता है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच सहमति बनती नहीं दिख रही।
क्या जल्द हो सकता है समझौता?
फिलहाल संकेत यही हैं कि बातचीत जारी रहेगी, लेकिन जल्द किसी बड़े समझौते की संभावना कम दिखाई दे रही है। दोनों देशों के बीच भरोसे की कमी, परमाणु कार्यक्रम पर मतभेद और क्षेत्रीय सुरक्षा गारंटी जैसे मुद्दे बातचीत को जटिल बना रहे हैं। अगर आने वाले दिनों में कोई संतुलित फार्मूला निकलता है, तो यह सिर्फ अमेरिका और ईरान के रिश्तों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया की ऊर्जा और सुरक्षा व्यवस्था के लिए बड़ा मोड़ साबित हो सकता है।
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