योगी कैबिनेट ने 2002-2017 के पंजीकृत दस्तावेजों के डिजिटाइजेशन की अवधि 6 माह बढ़ाई। 99% इंडेक्सिंग और 98% स्कैनिंग पूरी हो चुकी है। परियोजना बिना अतिरिक्त बजट के पूरी होगी, जिससे रिकॉर्ड सुरक्षित और फर्जीवाड़े पर रोक लगेगी।

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में उप निबंधक कार्यालयों में पंजीकृत पुराने दस्तावेजों के डिजिटाइजेशन को लेकर योगी सरकार ने महत्वपूर्ण निर्णय लिया है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में वर्ष 2002 से 2017 तक पंजीकृत विलेखों की स्कैनिंग और इंडेक्सिंग परियोजना की अवधि 6 माह बढ़ाने को मंजूरी दी गई है। परियोजना अपने अंतिम चरण में है और इसे पूरा करने के लिए किसी अतिरिक्त बजट की आवश्यकता नहीं बताई गई है।

परियोजना लागत और बजट की स्थिति

इस योजना को वर्ष 2022 में 95 करोड़ रुपये की लागत से स्वीकृति मिली थी। बाद में व्यावहारिक कारणों से काम में देरी होने पर जुलाई 2024 में इसकी अवधि बढ़ाई गई और कुल लागत 123.62 करोड़ रुपये कर दी गई। वित्तीय वर्ष 2024-25 के अंत तक इस परियोजना पर 109.05 करोड़ रुपये खर्च किए जा चुके हैं। शेष कार्य मौजूदा बजट में ही पूरा किया जाएगा।

99% से अधिक इंडेक्सिंग और 98% स्कैनिंग पूरी

प्रदेश स्तर पर इस परियोजना के तहत इंडेक्सिंग का 99.11 प्रतिशत और स्कैनिंग का 98.37 प्रतिशत कार्य पूरा हो चुका है। अधिकांश जिलों में काम पूरी तरह समाप्त हो गया है। फिलहाल एटा, वाराणसी, मुरादाबाद, मैनपुरी, लखनऊ, अलीगढ़, हाथरस, आगरा, सहारनपुर और प्रयागराज में कुछ कार्य बाकी है, जिसे अगले छह महीनों में पूरा कर लिया जाएगा।

दो स्तर की जांच से गुणवत्ता सुनिश्चित

डिजिटाइजेशन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए हर दस्तावेज का दो चरणों में सत्यापन किया जा रहा है। पहले स्तर पर सहायक महानिरीक्षक निबंधन द्वारा जांच की जा रही है। दूसरे स्तर पर मंडल और वृत्त के उप महानिरीक्षक निबंधन द्वारा दोबारा परीक्षण किया जा रहा है। यह प्रक्रिया तब तक जारी रहेगी जब तक 100 प्रतिशत सत्यापन पूरा नहीं हो जाता।

फर्जीवाड़े पर रोक और रिकॉर्ड की सुरक्षा

पुराने दस्तावेजों के डिजिटाइजेशन से कूटरचना और फर्जीवाड़े पर प्रभावी रोक लगेगी। जमीन-जायदाद से जुड़े रिकॉर्ड सुरक्षित और स्थायी रूप से संरक्षित रहेंगे। इससे आम लोगों को भी दस्तावेजों की उपलब्धता आसान होगी और प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ेगी।