संभल के गांव बनियाखेड़ा की अनुपमा सिंह ने स्वयं सहायता समूह और पंचगव्य उत्पादों के जरिए आत्मनिर्भरता हासिल की। गोमय से बने उत्पादों और हर्बल गुलाल से वे सालाना 2.5 लाख रुपये कमा रही हैं और अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं।

लखनऊ। कभी घर की चौखट से बाहर निकलने में झिझकने वाली गांव बनियाखेड़ा, जनपद संभल की अनुपमा सिंह आज अपने बनाए उत्पादों के जरिए पहचान बना चुकी हैं। मास्टर ऑफ सोशल वर्क की पढ़ाई पूरी करने के बाद अनुपमा ने शहरों की ओर रुख करने के बजाय अपने गांव में रहकर कुछ अलग करने का फैसला किया।

जब उन्होंने जानकी महिला स्वयं सहायता समूह के साथ कदम बढ़ाया, तो पंचगव्य आधारित उत्पादों ने उनकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी। आज अनुपमा मूर्तियां, दीपक, अगरबत्ती, दीवार घड़ी, चौकी, मोबाइल स्टैंड और अन्य उत्पाद बनाकर सालाना करीब 2.5 लाख रुपये की आमदनी कर रही हैं। इसके साथ ही वे गांव की अन्य महिलाओं को भी रोजगार देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना रही हैं। अनुपमा हर्बल गुलाल भी तैयार करती हैं, जिससे लोग बाजार में मिलने वाले केमिकल युक्त रंगों से सुरक्षित रह सकें।

स्वयं सहायता समूह से जुड़ाव ने बदली जीवन की दिशा

जानकी महिला स्वयं सहायता समूह से जुड़ने के बाद अनुपमा की जिंदगी में बदलाव की शुरुआत हुई। समूह की साप्ताहिक बैठकों से उन्हें सीखने और आगे बढ़ने का मंच मिला। कम ब्याज पर ऋण उपलब्ध हुआ, समस्याओं का समाधान सामूहिक रूप से होने लगा और पहली बार उन्होंने समूह से ऋण लेकर पंचगव्य उत्पादों का काम शुरू किया। समय पर ऋण चुकाना, नियमित बचत करना और अनुशासन के साथ काम करना उनके उद्यम की मजबूत नींव बना।

गोमय उत्पादों से बनी नई पहचान

प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद अनुपमा ने अपने घर से ही गोबर से बने उत्पादों का निर्माण शुरू किया। उन्होंने मूर्तियां, दीपक, अगरबत्ती, दीवार घड़ी, चौकी, मोबाइल स्टैंड और हर्बल गुलाल तैयार करना शुरू किया। धीरे-धीरे इन उत्पादों की पहचान गांव में बनने लगी। स्थानीय बाजारों और मेलों से ऑर्डर मिलने लगे। आज अनुपमा न केवल खुद काम कर रही हैं, बल्कि अपने स्वयं सहायता समूह की अन्य महिलाओं को भी रोजगार दे रही हैं, जिससे कई परिवारों की आय में बढ़ोतरी हुई है।

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से मिला तकनीकी सहयोग

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (NRLM) के तहत मिले प्रशिक्षण से अनुपमा को प्रोसेसिंग और पैकेजिंग की आधुनिक तकनीकें सीखने का अवसर मिला। इसका असर यह हुआ कि उनके उत्पादों की गुणवत्ता बेहतर हुई और मांग गांव से निकलकर आसपास के कस्बों तक पहुंच गई। आज गो आधारित ये उत्पाद उनके व्यवसाय का मजबूत आधार बन चुके हैं, जिससे उन्हें हर महीने करीब 20,000 रुपये की नियमित आय हो रही है।

गोमाता बनीं तरक्की और आत्मनिर्भरता का माध्यम

अनुपमा की सफलता यह साबित करती है कि सही मार्गदर्शन और अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं पंचगव्य और परंपरागत संसाधनों को आधुनिक व्यवसाय में बदल सकती हैं। आज अनुपमा अपने परिवार के साथ सम्मानजनक जीवन जी रही हैं। ग्राम पंचायत से लेकर जनपद स्तर तक लोग उन्हें उनके काम और आत्मनिर्भरता की मिसाल के रूप में जानते हैं।