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7 साल में यह 7563 नवजातों के लिए मरघट बना कोटा का जेके लोन अस्पताल

राजस्थान के कोटा स्थित मातृ एवं शिशु चिकित्सालय (जेके लोन) में गुरुवार को तड़के 3 बजे नवजातों की मौत को जो सिलसिला शुरू हुआ, वो 10.30 बजे तक 9वें बच्ची की मौत के बाद थमा। सिर्फ 8 घंटे में 9 नवजातों की मौत ने अस्पताल को जैसे मरघट बना दिया। बता दें कि इस अस्पताल में सिर्फ 7 साल में 7563 नवजातों की मौत हुई है। अकेले नवंबर- दिसंबर में सिर्फ 35 दिनों में 107 बच्चों की जान चली गई। कुछ ऐसा ही मामला पिछले दिनों मध्य प्रदेश के शहडोल जिला अस्पताल में सामने आया था। लेकिन इस मामले में जांच दल ने डॉक्टरों को क्लीन चिट दे दी।

9 newborn deaths in JK Lone Hospital in Kota, Rajasthan kpa
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Kota, First Published Dec 11, 2020, 9:47 AM IST
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कोटा, राजस्थान. यहां के मातृ एवं शिशु चिकित्सालय (जेके लोन) में गुरुवार को 9 नवजातों की मौत ने स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। इस मामले ने हड़कंप मचाकर रख दिया है। लोकसभा स्पीकर ओम बिरला सहित तमाम नेताओं और स्वयंसेवी संगठनों ने मामले की जांच कराने को कहा है। गुरुवार को तड़के 3 बजे नवजातों की मौत को जो सिलसिला शुरू हुआ, वो 10.30 बजे तक 9वें बच्ची की मौत के बाद थमा। सिर्फ 8 घंटे में 9 नवजातों की मौत ने अस्पताल को जैसे मरघट बना दिया। बता दें कि इस अस्पताल में सिर्फ 7 साल में 7563 नवजातों की मौत हुई है। अकेले नवंबर- दिसंबर में सिर्फ 35 दिनों में 107 बच्चों की जान चली गई। कुछ ऐसा ही मामला पिछले दिनों मध्य प्रदेश के शहडोल जिला अस्पताल में सामने आया था। लेकिन इस मामले में जांच दल ने डॉक्टरों को क्लीन चिट दे दी।

जानिए लोन में क्या हुआ...
यहां मरने वाले सभी बच्चे 1 से 7 दिन के थे। बच्चों की मौत के बाद कलेक्टर खुद अस्पताल पहुंचे। मामले की गंभीरता को समझते हुए अस्पताल में 5 अतिरिक्त डॉक्टर और 10 नर्सिंग स्टाफ तैनात करने के आदेश दिए। इस मामले ने सरकार की किरकरी करा दी है। चिकित्सा मंत्री रघु शर्मा ने रिपोर्ट तलब की है। जांच के लिए एक एक्सपर्ट कमेटी बनाई गई है। 

अस्पताल अधीक्षक डॉ. एससी दुलारा ने सफाई दी कि मरने वाले बच्चों में से 3 को जन्मजात बीमारी थी। एक का सिर नहीं था, जबकि दूसरे के सिर में पानी भरा हुआ था। तीसरे में शुगर की कमी थी। 2 बच्चे बूंदी से रेफर हुए थे। वे संक्रमित थे। अधीक्षक का कहना है कि अस्पताल में हर महीने करीब 100 बच्चों की मौत होती है। इस तरह यह घटना सामान्य बात है। बच्चों की मौत पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने चिंता जाहिर की है। उन्होंने कहा कि अस्पताल को प्रशासन की मांग पर केंद्र सरकार ने कई सुविधाएं मुहैया कराई थीं। इन सबके बावजूद अस्पताल में बच्चों की इस तरह मौतें चिंता का विषय हैं।

बता दें कि अस्पताल में जरूरी मेडिकल उपकरणों की कमी है। इस समय यहां 98 बच्चे भर्ती हैं। पिछले साल जब नवंबर- दिसंबर में सिर्फ 35 दिनों में 107 बच्चों की जान चली गई थी, तब दिल्ली से जांच के लिए टीम आई थी। उस वक्त पीडियाट्रिक विभाग के अध्यक्ष डॉ. अमृत लाल बैरवा को हटा दिया गया था।  कोटा दक्षिण से विधायक संदीप शर्मा ने इसके लिए राज्य सरकार को जिम्मेदार बताया है।

जानिए किस साल कितने नवजातों की मौत

2020 (10 दिसंबर तक) में 917

  • 2019 में 963
  • 2018 में 1005
  • 2017 में 1027
  • 2016 में 1193
  • 2015 में 1260
  • 2014 में 1198

मध्य प्रदेश के शहडोल जिला अस्पताल में 8 मासूमों की मौत, जांच दल ने दी डॉक्टरों को क्लीन चिट

पिछले दिनों मध्य प्रदेश के शहडोल जिला अस्पताल में 5 दिनों के अंदर 8 मासूम बच्चों की मौत से हड़कंप मच गया था। इस मामले में अस्पताल की अव्यवस्थाएं भी सामने आई थीं। अस्पताल में सिर्फ 20 बेड हैं, लेकिन 32 बच्चों को भर्ती रखा गया।  बच्चों की मौत का मामला सामने आने के बाद प्रशासन ने सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज जबलपुर के सीनियर डॉक्टरों डॉ. पवन घनघोरिया (पीडियाट्रिशनय विभाग के एचओडी) और सहायक प्राध्यापक डॉ. अखिलेंद्र सिंह परिहार की दो सदस्यीय टीम को जांच के लिए भेजा था।
 

टीम ने कहा इलाज अच्छा हुआ
जांच टीम ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि अस्पताल में बच्चों के इलाज में कोई कोताही नहीं बरती गई। हालांकि टीम ने स्टॉफ और नर्स की कमी जरूर मानी। सीएमएचओ डॉ. राजेश पांडे ने कहा कि हर साल इस तरह का सीजनल वेरीएशन यानी मौसमी परिवर्तन से ऐसी घटनाएं होती हैं। बता दें कि जनवरी में इसी अस्पताल में 6 मासूमों की मौत हुई थी। मामला जब तूल पकड़ा था, तब तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री तुलसी सिलावट अस्पताल का निरीक्षण करने जा पहुंचे थे।
 

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