Bhagwan Krishna ki Aarti: इस बार जन्माष्टमी का पर्व 4 सितंबर, शुक्रवार को मनाया जाएगा। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा मुख्य रूप से की जाती है और रात 12 बजे आरती करने की परंपरा भी है।

Krishna Aarti Hindi: भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और स्तुति के लिए कई आरतियां प्रचलित हैं, लेकिन ‘आरती कुंज बिहारी की’ सबसे लोकप्रिय आरतियों में शामिल है। जन्माष्टमी के दिन कृष्ण मंदिरों और घरों में भी भक्त इस आरती को श्रद्धा के साथ गाते हैं। मान्यता है कि इस आरती के जरिए भक्त भगवान कृष्ण की महिमा का गुणगान करते हैं। जन्माष्टमी की रात 12 बजे श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा की जाती है। इसके बाद आरती की जाती है। आगे जानिए कान्हा की आरती करने की आसान विधि।

जन्माष्टमी पर कैसे करें कान्हा की आरती?

- आरती से पहले भगवान श्रीकृष्ण की विधि-विधान से पूजा करें। इसके बाद कान्हा को कुमकुम या रोली से तिलक लगाएं और उनके सामने शुद्ध घी का दीपक जलाएं।
- भगवान श्रीकृष्ण को फूलों की माला पहनाएं। इसके बाद उन्हें माखन-मिश्री, धनिया पंजीरी और मौसमी फलों का भोग लगाएं।
- भोग लगाने के बाद घी के दीपक से लड्डू गोपाल की आरती करें। धार्मिक परंपरा में आरती उतारने की एक विशेष विधि भी बताई जाती है।
- सबसे पहले भगवान के चरणों से 4 बार, फिर नाभि से 2 बार, मुख के सामने 1 बार और अंत में पूरे शरीर के सामने 7 बार आरती उतारने की परंपरा बताई जाती है।
- आरती पूरी होने के बाद भगवान श्रीकृष्ण को प्रणाम करें और परिवार के सभी सदस्यों को आरती दिखाएं।

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भगवान श्रीकृष्ण की आरती (Aarti Kunj Bihari Ki Lyrics)

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की ॥
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला ।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला ।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली ।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं ।
गगन सों सुमन रासि बरसै;
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा ।
स्मरन ते होत मोह भंगा;
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरन छवि श्रीबनवारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू ।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू;
हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद;
टेर सुन दीन भिखारी की ॥ श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की…

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