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शुरू हो चुका है भगवान श्रीकृष्ण का प्रिय अगहन मास, इस महीने में क्या करें-क्या नहीं?

13 नवंबर, बुधवार से हिंदू कैलेंडर का नौवां महीना अगहन शुरू हो चुका है। धर्म ग्रंथों में इस महीने की विशेष महीना बताई गई है। अगहन को मार्गशीर्ष भी कहते हैं।

Aghan month has started, what should we do in this month?
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Ujjain, First Published Nov 14, 2019, 8:55 AM IST
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उज्जैन. स्कंदपुराण के अनुसार, भगवान की कृपा प्राप्त करने की कामना करने वाले श्रद्धालुओं को अगहन मास में व्रत आदि करना चाहिए। इस माह में किए गए व्रत-उपवास से भगवान श्रीकृष्ण की कृपा प्राप्त होती है।

नदी स्नान से मिलती है श्रीकृष्ण कृपा
इस महीने में नदी स्नान की बड़ी महिमा कही गई है। शास्त्रों के अनुसार, जब गोकुल में असंख्य गोपियों ने श्रीहरि को प्राप्त करने के लिए ध्यान लगाया तब श्रीकृष्ण ने अगहन महीने में विधिपूर्वक नदी स्नान की सलाह दी। इसमें नियमित विधिपूर्वक प्रात: स्नान करने और इष्टदेव को प्रणाम करने की भी बात कही गई है।

कैसे करें नदी स्नान?
मार्गशीर्ष में नदी स्नान के लिए तुलसी की जड़ की मिट्टी व तुलसी के पत्तों से स्नान करना चाहिए। स्नान के समय ऊं नमो नारायणाय या गायत्री मंत्र का जाप करना चाहिए।

इसलिए अगहन मास को कहते हैं मार्गशीर्ष
1.
अगहन मास को मार्गशीर्ष कहने के पीछे कई कारण हैं। भगवान श्रीकृष्ण की अनेक नामों से पूजा की जाती है। इन्हीं नामों में से एक मार्गशीर्ष भी श्रीकृष्ण का एक नाम है।
2- इस माह का संबंध मृगशिरा नक्षत्र से है। ज्योतिष शास्त्र में 27 नक्षत्र बताए गए हैं। इन्हीं 27 नक्षत्रों में से एक है मृगशिरा नक्षत्र। इस माह की पूर्णिमा मृगशिरा नक्षत्र से युक्त होती है। इसी वजह से इस मास को मार्गशीर्ष मास कहा गया है।
3. इस माह को मगसर, अगहन या अग्रहायण मास भी कहा जाता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार, श्रीकृष्ण ने कहा है मासानां मार्गशीर्षोऽहम् अर्थात् सभी महिनों में मार्गशीर्ष श्रीकृष्ण का ही स्वरूप है। मार्गशीर्ष मास में श्रद्धा और भक्ति से प्राप्त पुण्य के बल पर हमें सभी सुखों की प्राप्ति होती है।

अगहन मास में क्या करें- क्या नहीं?
1.
इस पूरे महीने में जीरे का सेवन नहीं करना चाहिए।
2. मार्गशीर्ष मास में अन्न का दान करना सर्वश्रेष्ठ पुण्य कर्म माना गया है। ऐसा करने पर हमारे सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। साथ ही सभी कामनाएं पूरी हो जाती हैं।
3. इस माह में नियमपूर्वक रहने से अच्छा स्वास्थ्य तो मिलता ही है, साथ में धार्मिक लाभ भी मिलता है।
 

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