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जानें कब शुरू होगी जगन्नाथ रथयात्रा, आखिर क्यों 14 दिनों के एकांतवास में जाते हैं भगवान?

भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा हर साल आषाढ़ शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होती है। इस रथ यात्रा का महत्व न सिर्फ ओडिशा और पूरे भारत बल्कि विदेशों में रहने वाले हिंदुओं के लिए भी उतना ही है। कई श्रद्धालु तो रथयात्रा में शामिल होने के लिए विदेशों से आते हैं।

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New Delhi, First Published Jun 17, 2022, 7:22 PM IST

Jagannath Rath Yatra 2022: पुरी में हर साल भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा (Jagannath Rath Yatra) निकाली जाती है। इस रथ यात्रा का महत्व न सिर्फ ओडिशा और पूरे भारत बल्कि विदेशों में रहने वाले हिंदुओं के लिए भी उतना ही है। कई श्रद्धालु तो रथयात्रा में शामिल होने के लिए विदेशों से आते हैं। बता दें कि इस बार रथ यात्रा 1 जुलाई से शुरू होगी। 

इस बार 1 जुलाई को ही क्यों शुरू होगी रथयात्रा?
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा हर साल आषाढ़ शुक्लपक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होती है। इस बार द्वितीया ति​थि का प्रारंभ 30 जून को सुबह 10 बजकर 49 मिनट से हो रहा है। वहीं यह तिथि 1 जुलाई को दोपहर 1 बजकर 9 मिनट तक रहेगी। चूंकि हिंदू धर्म में किसी भी चीज का प्रारंभ उदयातिथि पर होता है, एसे में इस साल भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा 1 जुलाई यानी शुक्रवार से शुरू होगी। 

कितने दिनों तक चलेगी रथयात्रा?
भगवान जगन्नाथ की रथयात्रा पुरी में हर साल आषाढ़ शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथी को शुरू होती है। द्वितीया से लेकर दशमी तक चलने वाली इस यात्रा को लेकर मान्यता है कि भगवान इन दिनों में लोगों के बीच रहते हैं। इस यात्रा में तीन रथ रहते हैं। इन रथों के बीच वाले रथ में बहन सुभद्रा और बगल वाले रथ में श्री कृष्णा और बलराम की प्रतिमाएं होती हैं। कहा जाता है कि इस रथयात्रा में शामिल होने से मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।

क्यों निकाली जाती है रथयात्रा?
वैसे तो रथयात्रा को लेकर कई मान्यताएं हैं। लेकिन एक पौराणिक मान्यता के मुताबिक, जब भगवान श्री कृष्ण, राधा जी से मिलने वृदांवन पहुंचे तो वृदांवन के गोप-गोपियां मारे खुशी के भगवान के रथ को अपने हाथों से खींचने लगे। इसके बाद उनके रथ को पूरे नगर में घुमाया गया। ऐसा कहा जाता है कि पुरी की रथ यात्रा भगवान श्री कृष्ण के वृंदावन यात्रा की याद में ही निकाली जाती है। कहा जाता है कि द्वारिकाधीश को सारे जग का नाथ मानते हुए वृदांवन के लोगों ने ही उन्हें भगवान जगन्नाथ नाम दिया है।

रथयात्रा के 15 दिन पहले होती है ये परंपरा : 
बता दें कि रथयात्रा के करीब 15 दिन पहले कुछ खास परंपराएं निभाई जाती हैं। 14 जून को ज्येष्ठ पूर्णिमा के मौके पर पर जगन्नाथ जी, बलभद्र जी और सुभद्रा जी को 108 घड़ों के जल से स्नान कराया गया। इसे सहस्त्रधारा स्नान भी कहते हैं। इस स्नान के चलते तीनों बीमार हो गए हैं। बीमार होने की वजह से अब तीनों 14 दिनों तक एकांतवास में रहेंगे। इसके बाद 15वें दिन उपचार के बाद वो दर्शन देंगे। तब तक जगन्नाथ मंदिर के कपाट बंद रहेंगे। 

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