बिहार की कुम्हरार सीट पर BJP ने 5 बार के विधायक का टिकट काट दिया है। इससे नाराज़ कायस्थ वोटर जनसुराज पार्टी का समर्थन कर रहे हैं, जिससे BJP के लिए यह सीट बचाना मुश्किल हो गया है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की तारीख नज़दीक आते ही सियासी सरगर्मी तेज़ हो गई है। सभी पार्टियां अपने-अपने प्रत्याशियों की लिस्ट जारी कर चुकी हैं, लेकिन पटना की कुम्हरार विधानसभा सीट पर बीजेपी की राह आसान नहीं दिख रही है। पार्टी ने यहां से लगातार पांच बार जीत दर्ज करने वाले अरुण कुमार सिन्हा का टिकट काट दिया है और उनकी जगह संजय गुप्ता को उम्मीदवार बनाया है। यही फैसला बीजेपी के परंपरागत वोट बैंक, कायस्थ समाज को रास नहीं आया है। पार्टी के राष्ट्रीय मंत्री ऋतुराज सिन्हा जब क्षेत्र के दौरे पर पहुंचे, तो कार्यकर्ताओं और कायस्थ समाज के लोगों ने जनसुराज पार्टी के उम्मीदवार प्रोफेसर केसी सिन्हा के समर्थन में “जनसुराज जिंदाबाद” और “केसी सिन्हा जिंदाबाद” के नारे लगाने शुरू कर दिए।

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मना करने पर भी नहीं रुके नारे, BJP नेताओं की फजीहत

मौके पर मौजूद बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं ने जब कार्यकर्ताओं को शांत कराने की कोशिश की, तो भीड़ और उग्र हो गई। लोगों ने स्पष्ट कहा कि “अरुण सिन्हा जैसे ईमानदार और लोकप्रिय विधायक को दरकिनार करना कायस्थ समाज का अपमान है।” स्थानीय स्तर पर कई कायस्थ संगठनों ने बीजेपी से टिकट बदलने के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की है।

जनसुराज को मिल सकता है फायदा 

इधर प्रशांत किशोर की पार्टी जनसुराज ने मौका भांपते हुए कुम्हरार सीट से प्रोफेसर और लेखक केसी सिन्हा को मैदान में उतार दिया है। केसी सिन्हा लंबे समय से शिक्षा और सामाजिक सुधार आंदोलनों से जुड़े रहे हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि अगर कायस्थ वोटों में बिखराव हुआ, तो बीजेपी की स्थिति इस सीट पर कमजोर पड़ सकती है, और जनसुराज इसका सीधा लाभ उठा सकती है।

कांग्रेस ने उतारा इंद्रदीप चंद्रवंशी को मैदान में

कांग्रेस ने भी इस हाई-प्रोफाइल सीट पर इंद्रदीप चंद्रवंशी को उम्मीदवार बनाया है। हालांकि, कांग्रेस इस सीट पर पिछली बार बहुत पीछे रही थी, इसलिए उसका फोकस युवा और शहरी वोटरों पर है। अब यहां मुकाबला त्रिकोणीय बनता दिख रहा है कि बीजेपी बनाम जनसुराज बनाम कांग्रेस।

कायस्थों की निर्णायक भूमिका

कुम्हरार विधानसभा क्षेत्र में कुल मतदाताओं की संख्या चार लाख से अधिक है, जिसमें कायस्थ समाज की संख्या सबसे निर्णायक मानी जाती है। इसके अलावा यादव, राजपूत, कोइरी, कुर्मी, ब्राह्मण और मुस्लिम वोटर भी यहां अहम भूमिका निभाते हैं। पिछले कई चुनावों में कायस्थों के एकजुट समर्थन से ही बीजेपी ने यह सीट लगातार अपने पास रखी है।

कुम्हरार सीट का इतिहास और सियासी अहमियत

पहले इस क्षेत्र को पटना सेंट्रल के नाम से जाना जाता था। 2008 के परिसीमन के बाद इसका नाम कुम्हरार रखा गया। यह पूरी तरह शहरी इलाका है और पटना की राजनीति की धड़कन माना जाता है। 2020 के चुनाव में बीजेपी के अरुण कुमार सिन्हा ने आरजेडी उम्मीदवार धर्मेंद्र कुमार को भारी मतों से हराया था। लेकिन इस बार टिकट कटने से समीकरण पूरी तरह बदल गए हैं।

BJP के लिए मुश्किलें, PK के लिए मौका

कुम्हरार का चुनाव अब सिर्फ़ सीट की लड़ाई नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। जहां बीजेपी अपने पुराने गढ़ को बचाने में जुटी है, वहीं प्रशांत किशोर और उनकी जनसुराज पार्टी इसे राजधानी में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने का सुनहरा मौका मान रही है।