बिहार में कांग्रेस का पतन आंतरिक कमजोरियों व बदलते सामाजिक समीकरणों का नतीजा है। पार्टी प्रासंगिकता के संकट से जूझ रही है, कई सीटों पर वोट नोटा से भी कम हैं। गठबंधन पर निर्भरता ने इसे और कमजोर किया है।

बिहार की राजनीति में कांग्रेस की गिरावट अब किसी अचानक हुई दुर्घटना जैसी नहीं, बल्कि वर्षों से चली आ रही आंतरिक असफलता, कमजोर रणनीति और बदलते सामाजिक समीकरणों को न समझ पाने की परिणति है। कभी बिहार की सत्ता की धुरी रही कांग्रेस आज इस स्थिति में है कि कई सीटों पर उसका वोट शेयर नोटा से भी नीचे चला गया। यह सिर्फ हार नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रासंगिकता के संकट की कहानी है। राहुल गांधी के लगातार दौरे, यात्राओं और भाषणों के बाद भी पार्टी इस विधानसभा चुनाव में दो अंकों का आंकड़ा तक नहीं छू सकी और सिर्फ 6 सीटों पर सिमट गई।

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सामाजिक न्याय की राजनीति ने बदल दिया समीकरण

कांग्रेस का पतन 1990 के दशक में तब शुरू हुआ जब बिहार की राजनीति ने जातीय पुनर्गठन और सामाजिक न्याय के नए राजनीतिक ढांचे को जन्म दिया। मंडल राजनीति के उदय के बाद कांग्रेस मुख्य राजनीतिक धारा से कटती चली गई। कांग्रेस नेतृत्व जमीन से दूर और जनता से संवादहीन हो गया, इसके बाद कांग्रेस कैडर दशकों तक संगठन निर्माण के बजाय नेतृत्व के इंतजार में रहा। इस दौरान लालू प्रसाद यादव, रामविलास पासवान और नीतीश कुमार जैसे नेता उभरे, लेकिन कांग्रेस अपनी भूमिका तय नहीं कर सकी।

गठबंधन की राजनीति ने अस्थायी ऑक्सीजन दी, इलाज नहीं

कांग्रेस धीरे-धीरे स्वतंत्र लड़ाई लड़ने वाली पार्टी से सहयोगी दल बनकर रह गई। 2005 के बाद यह धारणा लगभग तय हो गई कि बिहार में वह अकेले लड़कर जीतने की क्षमता खो चुकी है। 2015 में महागठबंधन की लहर ने उसे 27 सीटों का उधार का सम्मान दिया, लेकिन यह अपने दम पर नहीं था।

2020 में उसे 71 सीटों पर लड़ने का मौका मिला, लेकिन पार्टी केवल 19 सीटें जीत पाई, यानी विस्तार मिला, प्रभाव नहीं। 2025 में हालात और खतरनाक हो गए, कई सीटों पर कांग्रेस के वोट नोटा से भी कम रहे। यह संकेत है कि जनता पार्टी को विकल्प मानना भी बंद कर चुकी है।

कांग्रेस के बिहार में गिरते प्रदर्शन के सालवार आंकड़े (सीटें)

  • 1980 (अविभाजित बिहार): 169
  • 1985 (अविभाजित बिहार): 196
  • 1990 (अविभाजित बिहार): 71
  • 1995 (अविभाजित बिहार): 29
  • 2000 (अविभाजित बिहार): 23
  • 2005 (फरवरी): 10
  • 2005 (अक्टूबर): 09
  • 2010: 04
  • 2015: 27
  • 2020: 19
  • 2025: 06

कांग्रेस के सामने असली सवाल

आज कांग्रेस के लिए चुनौती केवल सीटें बढ़ाने की नहीं, बल्कि “क्या वह बिहार में अभी भी मायने रखती है या नहीं”, इस सवाल का जवाब खोजना है। भविष्य की रणनीति में उसे यह करना ही होगा। कांग्रेस को संगठन का पुनर्निर्माण होगा, साथ ही स्थानीय नेतृत्व तैयार करना भी एक चुनौती होगी। इसके साथ ही जमीनी कैडर सक्रिय करना और नए सामाजिक समीकरणों की समझ बनाना भी एक चुनौती है। इसके अलावा कांग्रेस को गठबंधन पर निर्भरता भी कम करना होगा। अगर कांग्रेस इस मोड़ से भी सबक नहीं लेती, तो बिहार की राजनीति में उसका अस्तित्व सिर्फ इतिहास की किताबों में शेष रह जाएगा, मैदान में नहीं।