कर्नल कुरैशी पर विवादित टिप्पणी ने मंत्री विजय शाह को सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा दिया, जहां कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा—संवैधानिक पदों पर बैठे लोग शब्दों की गंभीरता समझें। FIR पर रोक नहीं, अगली सुनवाई 16 मई को। 

Vijay Shah Supreme Court: मध्य प्रदेश के जनजातीय कार्य मंत्री कुंवर विजय शाह को उस वक्त बड़ा झटका लगा जब सुप्रीम कोर्ट ने उनके खिलाफ हाईकोर्ट द्वारा दिए गए एफआईआर दर्ज करने के आदेश पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। मंत्री शाह ने कर्नल सोफिया कुरैशी पर कथित आपत्तिजनक टिप्पणी के चलते दर्ज एफआईआर को रद्द करने की याचिका दाखिल की थी।

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‘संवैधानिक पद पर बैठा व्यक्ति ऐसी बात कैसे कर सकता है?’ - सुप्रीम कोर्ट

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने सख्त लहजे में मंत्री विजय शाह की खिंचाई की। कोर्ट ने कहा, "जब देश एक संवेदनशील स्थिति से गुजर रहा हो, तो किसी संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति को बेहद जिम्मेदारी के साथ बयान देना चाहिए। उन्हें पता होना चाहिए कि वे क्या कह रहे हैं।"

कर्नल सोफिया कुरैशी: ऑपरेशन सिंदूर की जानकारी देने वाली सेना अधिकारी

कर्नल सोफिया कुरैशी भारतीय सेना की जांबाज़ अफसर हैं, जिन्होंने हाल ही में आतंकी ठिकानों पर की गई कार्रवाई 'ऑपरेशन सिंदूर' की जानकारी प्रेस को दी थी। इसी को लेकर मंत्री विजय शाह ने कथित रूप से उन्हें "आतंकियों की बहन" कह दिया था।

हाईकोर्ट ने भी कहा था – “खतरनाक और कैंसरकारी बयान”

14 मई को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने मंत्री विजय शाह की टिप्पणी को बेहद आपत्तिजनक, सामाजिक सौहार्द के लिए हानिकारक और "कैंसरकारी" बताते हुए एफआईआर दर्ज करने का आदेश दिया था।

FIR पर रोक की मांग खारिज, अब अगली सुनवाई 16 मई को

शाह की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि उनकी बातों को गलत तरीके से पेश किया गया है और वह सेना का सम्मान करते हैं। लेकिन कोर्ट ने कोई अंतरिम राहत नहीं दी। अब यह मामला 16 मई को पुनः सुप्रीम कोर्ट में सुना जाएगा।

विपक्ष का वार: कांग्रेस ने की बर्खास्तगी की मांग

इस विवाद को लेकर विपक्ष खासा आक्रामक है। कांग्रेस पार्टी ने शाह की बर्खास्तगी की मांग करते हुए उन्हें "देश की बेटियों का अपमान करने वाला मंत्री" बताया है। राज्यभर में कांग्रेस ने विरोध प्रदर्शन भी किए।

कौन हैं कर्नल सोफिया कुरैशी?

कर्नल कुरैशी देश की पहली महिला सैन्य अधिकारी हैं, जिन्होंने 2016 में विदेश में भारतीय सैन्य टुकड़ी का नेतृत्व किया था। वे सेना में आने से पहले पीएचडी कर रही थीं और पढ़ाने का कार्य भी कर रही थीं, लेकिन देशसेवा की भावना ने उन्हें वर्दी पहनने के लिए प्रेरित किया।

क्या राजनीतिक रणनीति का हिस्सा था यह बयान?

इस पूरे प्रकरण को लेकर सवाल उठ रहे हैं कि क्या मंत्री शाह की टिप्पणी राजनीतिक ध्रुवीकरण का हिस्सा थी या फिर यह सिर्फ एक गैर-जिम्मेदाराना बयान था। कोर्ट अब इस पूरे मामले की गंभीरता से जांच करेगा।