महाराष्ट्र के वर्धा रेलवे स्टेशन के पास बारिश से भरे गड्ढे में चार मासूम बच्चों की डूबकर मौत हो गई। गड्ढा रेलवे फ्लाईओवर निर्माण के दौरान बना था। परिवार ने रेलवे अधिकारियों और ठेकेदार पर लापरवाही का आरोप लगाकर मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।

Maharashtra Rain Accident: महाराष्ट्र में लगातार हो रही बारिश अब लोगों की जान पर भारी पड़ रही है। बुधवार को यवतमाल ज़िले के दारव्हा कस्बे में एक दर्दनाक हादसा हुआ, जिसने पूरे इलाके को दहला दिया। रेलवे फ्लाईओवर निर्माण के लिए खोदे गए गहरे गड्ढे में चार मासूम बच्चे डूब गए। घटना ने न सिर्फ़ परिवार बल्कि पूरे जिले को शोक में डुबो दिया है।

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आखिर कैसे हुआ यह दर्दनाक हादसा?

पुलिस के मुताबिक मृतक बच्चों की उम्र 10 से 14 साल के बीच थी। यह घटना दारव्हा रेलवे स्टेशन के पास हुई, जहां फ्लाईओवर निर्माण कार्य चल रहा था। खंभे लगाने के लिए खोदा गया गड्ढा बारिश के पानी से पूरी तरह भर गया था। बच्चे पास में खेल रहे थे और आशंका है कि खेलते-खेलते वे उसमें गिर गए। दो बच्चे पानी में डूबे और उन्हें बचाने की कोशिश में दो और मासूमों की भी मौत हो गई।

मृतक बच्चों की पहचान किसके रूप में हुई?

इस हादसे में जिन मासूमों की जान गई उनकी पहचान रिहान असलम खान (13), गोलू पांडुरंग नारनवारे (10), सौम्या सतीश खड़सन (10) और वैभव आशीष बोधाले (14) के रूप में हुई है। चारों बच्चे दारव्हा इलाके के रहने वाले थे। इस त्रासदी के बाद पूरे कस्बे में मातम पसर गया है।

क्या रेलवे और ठेकेदार की लापरवाही है जिम्मेदार?

स्थानीय लोगों का आरोप है कि रेलवे और निर्माण कंपनी की बड़ी लापरवाही के कारण यह दर्दनाक हादसा हुआ। गड्ढे को सुरक्षित करने की कोई व्यवस्था नहीं की गई थी, न ही वहां कोई चेतावनी बोर्ड लगाया गया। परिवारों ने रेलवे अधिकारियों और कांट्रैक्टर के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की मांग की है।

प्रशासन ने जांच क्यों शुरू की?

घटना के बाद पुलिस और प्रशासन ने जांच शुरू कर दी है। निर्माण कंपनी पर सवाल उठ रहे हैं और यह भी देखा जा रहा है कि क्या सेफ्टी नियमों की अनदेखी की गई थी। शुरुआती जांच से पता चलता है कि गड्ढे को ढकने या सुरक्षित करने में गंभीर चूक हुई थी।

क्या मासूमों की जान बचाई जा सकती थी?

यह सवाल अब हर किसी के मन में है। अगर निर्माण स्थल पर सुरक्षा इंतज़ाम होते, चेतावनी बोर्ड लगाए जाते या गड्ढे को घेर दिया जाता, तो शायद चार मासूमों की जान बच सकती थी। यह घटना रेलवे और प्रशासन दोनों के लिए सवाल खड़े करती है।