दौसा उपचुनाव में किरोड़ी लाल मीणा के भाई जगमोहन मीणा हार गए। भिक्षा मांगने जैसे अनोखे प्रचार के बावजूद, कांग्रेस ने जीत हासिल की। यह हार किरोड़ी लाल की राजनीतिक पकड़ कमजोर होने का संकेत देती है।

दौसा. राजस्थान में हाल ही में हुए उपचुनावों ने राजनीतिक हलचल को तेज कर दिया है। इनमें से दौसा विधानसभा सीट पर खासतौर से सभी की निगाहें थीं, जहां बीजेपी उम्मीदवार जगमोहन मीणा और कांग्रेस के दीनदयाल बैरवा के बीच मुकाबला था। हालांकि, यह चुनाव केवल उम्मीदवारों तक सीमित नहीं था, बल्कि एक बड़े राजनीतिक दांव का हिस्सा था, क्योंकि इस सीट से जुड़ी थी किरोड़ी लाल मीणा की साख।

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किशोरी लाल मीणा ने झोंक दी थी सारी ताकत

बीजेपी के कद्दावर नेता किरोड़ी लाल मीणा ने चुनाव प्रचार में अपनी पूरी ताकत झोंकी। उन्होंने अपने भाई जगमोहन मीणा की जीत सुनिश्चित करने के लिए न केवल प्रचार में हिस्सा लिया, बल्कि ‘भिक्षाम देहि’ का अभियान भी चलाया, ताकि वोटरों तक पहुंच सके। हालांकि, उनका यह प्रयास भी रंग नहीं लाया और कांग्रेस के दीनदयाल बैरवा ने 2,109 वोटों से जीत हासिल की। इस नतीजे ने यह साफ कर दिया कि दौसा के वोटरों ने बीजेपी को नजरअंदाज किया और कांग्रेस के पक्ष में वोट डाले।

मंत्री पद त्याग देना भी नहीं आया काम

दौसा उपचुनाव का नतीजा महज एक सीट का सवाल नहीं था, बल्कि यह एक महत्वपूर्ण राजनीतिक संकेत भी था। इससे यह तय हो गया कि किरोड़ी लाल मीणा की राजनीति में कुछ कमजोरी आ चुकी है, जो पिछले चुनावों में उनके नेतृत्व में पार्टी के कमजोर प्रदर्शन को दर्शाता है। इससे पहले, किरोड़ी लाल ने कई लोकसभा सीटों पर पार्टी को जीत दिलाने का प्रयास किया था, लेकिन नतीजे उनकी उम्मीदों के विपरीत रहे थे, जिसके बाद उन्होंने मंत्री पद से इस्तीफा देने की भी घोषणा की थी।स

सचिन पायलट का चल गया दौसा में जादू

इस उपचुनाव में कांग्रेस के नेता सचिन पायलट की भी साख दांव पर थी। उनका प्रभाव इलाके में मजबूत माना जाता है और उनके प्रयासों ने कांग्रेस को फायदा पहुंचाया। पायलट का 'फैक्टर' इस जीत में महत्वपूर्ण था, जिससे यह साबित हुआ कि स्थानीय नेतृत्व के प्रभाव का बड़ा रोल है। इस उपचुनाव ने न केवल बीजेपी और कांग्रेस के बीच की जंग को उजागर किया, बल्कि यह भी दिखा दिया कि राजस्थान की राजनीति में छोटे नेताओं और उनके व्यक्तिगत प्रयासों का बड़ा असर होता है।