सोशल मीडिया और शॉर्ट रील्स को बच्चों के लिए ‘साइलेंट किलर’ क्यों बताया जा रहा है? स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी बच्चों की सेहत पर क्या असर डालती है? मोबाइल और गेम्स की लत बच्चों के शारीरिक विकास को किस तरह प्रभावित कर रही है?

आज का दौर ऐसा है कि बच्चा पैदा होते ही मां के दूध से ज़्यादा मोबाइल की स्क्रीन पर नज़रें गड़ाए रहता है। खाना खिलाना हो तो यूट्यूब चाहिए, बच्चा रोए नहीं इसके लिए हाथ में स्मार्टफोन थमाना ज़रूरी हो गया है। लेकिन याद रखिए, आप प्यार से बच्चे के हाथ में जो मोबाइल दे रहे हैं, वो शराब या सिग-रेट से भी बड़ी लत बनता जा रहा है! हां, ये सुनने में अजीब लग सकता है, लेकिन सोशल मीडिया आज बच्चों के लिए एक 'साइलेंट किलर' बन चुका है।

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रील्स की दुनिया का मायाजाल - बच्चों के दिमाग में ज़हर!

इंस्टाग्राम और फेसबुक पर दिखने वाली 15 सेकंड की रील्स बच्चों के दिमाग को 'डोपामिन लूप' (Dopamine Loop) नाम के एक भंवर में फंसा देती हैं। किसी इन्फ्लुएंसर को शानदार ज़िंदगी जीते देख, बच्चा अपनी ज़िंदगी की तुलना उससे करने लगता है। "मेरे पास वो खिलौना क्यों नहीं है?", "क्या मैं उसके जितना सुंदर नहीं हूं?" जैसी बातें छोटी उम्र में ही बच्चों में डिप्रेशन और एंग्जायटी (Depression and Anxiety) की वजह बन रही हैं। लाइक्स और कमेंट्स पाने की ये होड़ बच्चों को मानसिक रूप से थका रही है।

आंखों की रोशनी छीनती ‘नीली रोशनी’

दिन भर मोबाइल और रात भर गेम्स! इसका नतीजा ये है कि छोटी उम्र में ही बच्चों को मोटे-मोटे चश्मे लग रहे हैं। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी बच्चों के दिमाग में 'मेलाटोनिन' (Melatonin) नाम के हॉर्मोन पर हमला करती है। इससे उनकी नींद का पैटर्न बिगड़ जाता है और बच्चे हर वक़्त चिड़चिड़े या परेशान रहने लगते हैं। देर रात तक स्क्रॉलिंग करने से सिरदर्द और ध्यान भटकने की समस्या आम हो गई है।

मैदान भूले बच्चे - घर में ही बढ़ रहा मोटापा

एक ज़माना था जब शाम होते ही बच्चे खेलने के लिए मैदान की तरफ भागते थे। लेकिन अब? अब वे घर के किसी कोने में बैठकर फोन से चिपके रहते हैं। फिजिकल एक्टिविटी ज़ीरो होने से बच्चों में मोटापा (Obesity), रीढ़ की हड्डी से जुड़ी समस्याएं और विटामिन डी की कमी देखने को मिल रही है। बाहर की दुनिया के असली दोस्तों से ज़्यादा, वर्चुअल दुनिया के 'फेक' फ्रेंड्स बच्चों को प्यारे लगने लगे हैं। यह उनके सामाजिक विकास को भी रोक रहा है।

पेरेंट्स ध्यान दें, आप क्या कर सकते हैं?

बच्चों को टेक्नोलॉजी से पूरी तरह दूर रखना आज के ज़माने में नामुमकिन है। लेकिन इस पर लगाम लगाना आपके हाथ में है:

डिजिटल कर्फ्यू: खाने की टेबल और सोने के कमरे में मोबाइल का इस्तेमाल पूरी तरह बैन कर दें।

रोल मॉडल बनें: अगर आप खुद दिनभर फोन में लगे रहेंगे, तो बच्चे भी वही सीखेंगे। पहले आप अपना स्क्रीन टाइम कम करें।

खुलकर बात करें: ऑनलाइन खतरों, साइबर सुरक्षा और ट्रोलिंग के बारे में बच्चों को प्यार से समझाएं।

बाहर खेलने पर ज़ोर दें: दिन में कम से कम एक घंटा बच्चे के साथ बाहर जाकर खेलें या उसे एक्सरसाइज के लिए प्रेरित करें।

याद रखिए, बच्चे को मोबाइल देना उसे सुकून देना नहीं, बल्कि उसके भविष्य की सेहत के साथ खेलना है। 'स्मार्ट' फोन के इस्तेमाल में आपकी 'स्मार्टनेस' ही आपके बच्चे के भविष्य को सुरक्षित रखेगी!