एक ऐसा आइलैंड जहां के लोगों को दुर्लभ बीमारी है। इस आइलैंड पर पूरी जनसंख्या की करीब दस प्रतिशत आबादी को दुनिया रंगीन नहीं सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट नजर आती है। आइए जानते हैं कि यहां लोगों को कलर ब्लाइंडनेस क्यों है। 

नई दिल्ली। इस खास आइलैंड का नाम पिंगलेप है और यहां रहने वाले लोगों को एक खास दुर्लभ बीमारी है। यहां रहने वाली कुल जनसंख्या का करीब दस प्रतिशत हिस्सा कलर ब्लाइंडनेस से पीड़ित है। ये लोग ऐसे हैं, जिन्हें दुनिया रंगीन नहीं सिर्फ ब्लैक एंड व्हाइट नजर आती है। 

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पिंगलेप नाम का यह आइलैंड प्रशांत महासागर यानी पैसिफिक ओसियन में है। बताया जाता है कि ओशियानिया इलाके में माइक्रोनेशिया देश है। आस्ट्रेलिया के नजदीक बसे इस देश के अंतर्गत एक आइलैंड आता है, जिसका नाम पिंगलेप है। वर्ष 1775 में इस आइलैंड पर एक जबरदस्त तूफान आया था। 

तूफान में राजा के साथ बचे 20 लोग
इस तूफान में आइलैंड पर रहने वाले बहुत से लोग मारे गए, जबकि सिर्फ 20 लोग बचे। इन जीवित बचे लोगों में वहां का राजा भी शामिल था। दावा किया जाता है कि तभी से यहां रहने वाले लोगों को कलर ब्लाइंडनेस की दिक्कत होने लगी और यह आज तक बरकरार है। यह ऐसा रोग है लोगों को रंग दिखते ही नहीं। अगर दिख भी जाए तो उसे पहचाने में मुश्किल आती है। 

राजा की वजह से यह बीमारी आइलैंड पर फैली!
एक तो पिंगलेप की जनसंख्या पहले से कम थी। अब इस तूफान के बाद वहां की आबादी समुद्र में बह गई और बचे सिर्फ 20 लोग। दावा यह भी किया जाता है कि राजा में रिसेसिव जीन था। इस तूफान के बाद आबादी बढ़ाने के लिए उसने फिर बच्चे पैदा किए और जो बच्चे पैदा हुए उनमें भी ये जीन पहुंच गए और उन्हें ये बीमारी हो गई और यह सिलसिला अब तक चला आ रहा है। 

30 हजार लोगों में से एक होता है यह रिसेसिव जीन
दावा किया जाता है कि यह जीन आइलैंड पर बचे रह गए कम लोगों के बीच हुए प्रजनन के कारण आगे आई जनसंख्या में भी फैला। यह रिसेसिव जीन पूरी दुनिया में करीब 30 हजार लोगों में से एक में होता है। हालांकि, पिंगलेप आइलैंड इसका अपवाद है और यहां करीब दस प्रतिशत आबादी को इस दुर्लभ बीमारी ने अपनी चपेट में ले रखा है। 

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