आश्विन मास की पूर्णिमा को धर्म ग्रंथों में बहुत ही खास बताया गया है। माना जाता है कि पूरे साल में सिर्फ इसी तिथि पर चंद्रमा अपनी पूरी 16 कलाओं के साथ होता है। शरद ऋतु में आने के कारण इसे शरद पूर्णिमा कहते हैं। इस बार शरद पूर्णिमा 30 अक्टूबर को थी लेकिन पूर्णिमा तिथि के दौरान तीर्थ में स्नान और दान 31 अक्टूबर को किया जाएगा।

उज्जैन. हिंदू कैलेंडर के सातवें महीने यानी आश्विन मास की पूर्णिमा को धर्म ग्रंथों में बहुत ही खास बताया गया है। काशी के ज्योतिषाचार्य पं. गणेश मिश्र के अनुसार, पूरे साल में सिर्फ इसी तिथि पर चंद्रमा अपनी पूरी 16 कलाओं के साथ होता है। शरद ऋतु में आने के कारण इसे शरद पूर्णिमा कहते हैं। इस बार शरद पूर्णिमा 30 अक्टूबर को थी लेकिन पूर्णिमा तिथि के दौरान तीर्थ में स्नान और दान 31 अक्टूबर को किया जाएगा।

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दान का महत्व
- ग्रंथों में बताया गया है कि शरद पूर्णिमा (31 अक्टूबर) पर कांसे के बर्तन में घी भरकर दान करने से हर तरह के रोग और दोष खत्म हो जाते हैं।
- अश्विन पूर्णिमा पर तीर्थ स्थान पर स्नान का भी विशेष महत्व है, अगर ऐसा न कर पाएं तो घर पर ही पानी में गंगाजल की कुछ बूंदे डालकर स्नान करना चाहिए। इससे भी पुण्य फलों की प्राप्ति होती है।
- इस दिन पानी में आंवला का रस और अन्य औषधियां डालकर नहा लेने से भी हर तरह के पाप खत्म हो जाते हैं।

आश्विन पूर्णिमा व्रत और पूजा विधि
- पूर्णिमा पर सूर्योदय से पहले उठकर नहाएं और व्रत, पूजा और श्रद्धा अनुसार दान का संकल्प लें।
- श्रीकृष्ण या भगवान विष्णु की पूजा करें। आचमन, वस्त्र, गंध, अक्षत, फूल, धूप, दीप, नैवेद्य, पान, सुपारी और दक्षिणा के साथ पूजा की जा सकती है।
- पूर्णिमा का व्रत करके सत्यनारायण भगवान की कथा सुनें। इसके बाद संकल्प के अनुसार दान करें।
- ग्रंथों में कहा गया है कि कांसे के बर्तन में घी भरकर दान करना चाहिए। इसके अलावा किसी मंदिर में अन्न, वस्त्र या भोजन का भी दान कर सकते हैं।