यूपी चुनाव के पहले चरण में आगरा में 10 फरवरी को ही मतदान होना है। यहां चुनाव को लेकर सभी राजनीतिक दल के उम्मीदवार और समर्थक पूरी तरह से उत्साहित दिखाई दे रहे हैं। हालांकि आगरा में महिला उम्मीदवारों की बात की जाए तो उसका प्रतिशत काफी कम है। यहां 9 विधानसभा सीटों पर 10 फीसदी से भी कम महिला उम्मीदवार चुनावी मैदान में हैं। 

आगरा: यूपी चुनाव (UP Chunav 2022) के पहले चरण को लेकर सभी राजनीतिक दल तैयारियों को मूर्त रूप देने में लगे हुए हैं। पहले चरण के लिए 10 फरवरी को मतदान होना है। आगरा जिले की भी 9 विधानसभा सीटों पर चुनाव पहले चरण में ही होगा। हालांकि यहां की 9 विधानसभा सीटों पर आधी आबादी की हिस्सेदारी 10 फीसदी से भी कम है। यहां 107 प्रत्याशियों में से सिर्फ 10 महिलाएं ही चुनाव लड़ रही हैं। यहां भाजपा और कांग्रेस ने 2-2 जबकि सपा-रालोद गठबंधन और बसपा ने 1-1 महिला प्रत्याशी पर भरोसा जताया है। वहीं 2 महिलाओं को छोटे दलों का साथ मिला है। अन्य ने निर्दलीय नामांकन किया है।

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कांग्रेस ने 2 प्रत्याशियों पर जताया भरोसा
आगरा की 9 विधानसभा सीटों पर 15.81 लाख से भी अधिक मतदाता है। हालांकि यहां महिला प्रत्याशियों को जो टिकट मिला है वह काफी कम है। कांग्रेस भले ही लड़की हूं लड़ सकती हूं का नारा बुलंद कर 40 फीसदी महिलाओं को टिकट देने का दावा कर रही हो लेकिन यह 9 सीटों में से सिर्फ 2 पर ही महिला उम्मीदवार को उतारा गया है। कांग्रेस ने एत्मादपुर से शिवानी देवी और बाह विधानसभा सीट से मनोज दीक्षित को चुनाव में प्रत्याशी बनाया है। 

भाजपा ने पूर्व राज्यपाल और एक अन्य पर जताया भरोसा 
आगरा से भाजपा ने भी चुनावी मैदान में 2 महिला प्रत्याशियों पर भरोसा जताया है। इसमें ग्रामीण सीट से पूर्व राज्यपाल बेबी रानी मौर्या और बाह विधानसभा क्षेत्र से भदावर घराने की बहू रानी पक्षालिका सिंह को उम्मीदवार बनाया गया है। वहीं आगरा ग्रामीण सीट से बसपा ने किरन प्रभा केसरी पर दांव लगाया है। 

सपा ने रूपाली दीक्षित पर जताया भरोसा 
सपा आरएलडी गठबंधन ने आगरा से सिर्फ एक ही महिला उम्मीदवार को चुनावी मैदान में उतारा है। समाजवादी पार्टी की ओर से फतेहाबाद विधानसभा सीट से रूपाली दीक्षित पर भरोसा जताया गया है। 

इन 4 सीटों से महिला प्रत्याशी ही नदारद 
आगरा की 4 विधानसभा सीट ऐसी हैं जहां पर कोई भी महिला प्रत्याशी नहीं है। आगरा उत्तर, दक्षिण, खेरागढ़ और छावनी में आधी आबादी का प्रतिनिधित्व भी पूरे तौर से पुरुषों के हाथों में दिख रहा है। जाहिर तौर पर भले ही सभी राजनीतिक दल महिलाओं को लेकर जो भी वादे करते हों लेकिन सामने आ रही सच्चाई चौंकाने वाली है।