अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन के उत्पादों पर 10% टैरिफ लगाने के फैसले के बाद, गूगल पहली अमेरिकी कंपनी बनी जिसे चीन के विरोध का सामना करना पड़ रहा है। 

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चीन पर टैरिफ लगाने की घोषणा के बाद, गूगल पहली अमेरिकी कंपनी बन गई है जिसे अब चीन के प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है। ट्रंप प्रशासन ने चीनी उत्पादों पर 10% टैरिफ लगाए थे इसके जवाब में चीन ने न सिर्फ अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ लगाए बल्कि गूगल के खिलाफ एंटीट्रस्ट जांच भी शुरू कर दी।

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चीन ने अमेरिकी कोयला और एलएनजी के निर्यात पर 15% शुल्क और तेल व कृषि उपकरणों पर 10% शुल्क लगा दिया है। ये घटनाक्रम दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच व्यापारिक तनाव को बढ़ावा दे रहे हैं, जिसका वैश्विक स्तर पर गहरा प्रभाव पड़ सकता है।

2010 में अधिकत्तर सेवाएं हो गई थी बंद

चीन में 2010 से गूगल की ज्यादात्तर सेवाएं बंद हैं, लेकिन कंपनी वहां विज्ञापन की सेवाएं जारी रखा है। ये सेवाएं उन चीनी कंपनियों की मदद करती है, जो गूगल पर विदेशों में अपने उत्पादों का प्रचार करना चाहती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन की यह कार्रवाई अमेरिकी कंपनियों के लिए एक चेतावनी है, जो चीन के बाजार पर निर्भर हैं। ING बैंक, हांगकांग की अर्थशास्त्री लिन सॉन्ग ने कहा, "संभावना है कि आमने-सामने की बातचीत के बाद टैरिफ हटाए या टाले जा सकते हैं।

CNBC की एक रिपोर्ट के मुताबिक, Capital Economics में चीन अर्थशास्त्र प्रमुख जूलियन इवांस प्रिचार्ड ने कहा कि गूगल के खिलाफ चीन की जांच बिना किसी दंड के समाप्त हो सकती है। तनाव और बढ़ाते हुए, चीनी अधिकारियों ने PVH कॉर्प (Calvin Klein की मालिक) और अमेरिकी जीन सीक्वेंसिंग कंपनी Illumina Inc को भी ब्लैकलिस्ट में शामिल कर दिया है।

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चीन के वित्त मंत्रालय ने कही ये बात

चीन के वित्त मंत्रालय ने अमेरिकी टैरिफ की आलोचना करते हुए कहा,"अमेरिका का चीन पर एकतरफा टैरिफ लगाना विश्व व्यापार संगठन (WTO) के नियमों का गंभीर उल्लंघन है। यह न केवल अमेरिका की खुद की समस्याओं को हल करने में विफल रहेगा, बल्कि चीन और अमेरिका के बीच सामान्य आर्थिक और व्यापारिक सहयोग को भी नुकसान पहुंचाएगा।"