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विवाद: 139 करोड़ आबादी वाले चीन पर कैसे भारी पड़ रहा 2.3 करोड़ की जनसंख्या वाला ताइवान

ताइवान आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ चाइना नाम से जाना जाता है। यह चीन के दक्षिणी तट में स्थित एक द्वीप है। ताइवान 1949 से स्वतंत्र रूप से शासित है। वहीं, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना इसे एक प्रांत मानती है। जबकि ताइवान में लोकतांत्रिक रूप से सरकार चुनी जाती है। इस क्षेत्र की आबादी 2.3 करोड़ है। 

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New Delhi, First Published Jun 19, 2020, 1:53 PM IST
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बीजिंग. पूर्वी लद्दाख में सीमा को लेकर भारत और चीन का विवाद अपने चरम पर है। 15 जून को हुई हिंसक झड़प में भारत में 20 जवान शहीद हुए हैं। जबकि चीन के 35-40 सैनिक हताहत होने की खबर है। हालांकि, चीन ने आधिकारिक आंकड़े जारी नहीं किए हैं। भारत अकेला देश नहीं है, जिससे चीन का विवाद चल रहा है। चीन की विस्तारवादी नीति के चलते तजाकिस्तान, किर्गिस्तान, अफगानिस्तान, नेपाल और पाकिस्तान के साथ भी सीमा विवाद है। इसके अलावा 'वन चाइना टू सिस्टम' को लेकर ताइवान और हॉन्गकॉन्ग के साथ भी विवाद चल रहा है। चीन दोनों स्वतंत्र इकाइयों को अपना प्रांत बताता है।

ताइवान आधिकारिक तौर पर रिपब्लिक ऑफ चाइना नाम से जाना जाता है। यह चीन के दक्षिणी तट में स्थित एक द्वीप है। ताइवान 1949 से स्वतंत्र रूप से शासित है। वहीं, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना इसे एक प्रांत मानती है। जबकि ताइवान में लोकतांत्रिक रूप से सरकार चुनी जाती है। इस क्षेत्र की आबादी 2.3 करोड़ है। राजनीतिक नेताओं के द्वीप की स्थिति और संबंधों पर अलग-अलग विचार हैं।

एक चीन सिद्धांत (वन चाइना प्रिंसिपल)

ताइवान और चीन के बीच स्थिति को लेकर काफी असहमति है। पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना का दावा है कि वह एक चीन सिद्धांत को मानता है और ताइवान उसका हिस्सा है। चीन का कहना है कि ताइवान 1992 में हुए समझौते से बंधा है। यह समझौता चीनी कम्युनिस्ट पार्टी और ताइवान की तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कुओमिनतांग के बीच हुआ था। 

1992 के समझौते के मुताबिक, केवल 'एक चीन' है, लेकिन इसमें अलग-अलग व्याख्याओं की अनुमति है। इसपर चीन और बीजिंग दोनों सहमत हैं कि ताइवान चीन से संबंधित हैं। लेकिन इस पर असहमति है कि कौन सी इकाई चीन के निकाय के अंतर्गत है। 

ताइवान ने खारिज किया वन चाइना, टू सिस्टम
1992 की आम सहमति के आधार पर समझौता यह है कि ताइवान स्वतंत्रता नहीं मानेगा। ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने इस समझौते को सिरे से खारिज कर दिया। 

 संयुक्त राज्य अमेरिका ने 1979 में बीजिंग के साथ औपचारिक राजनयिक संबंधों की स्थापना की। साथ ही कहा गया कि अमेरिका चीन की स्थिति को स्वीकार करता है कि एक चीन है और ताइवान चीन का हिस्सा हैं। अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने ताइवान के साथ भी राजनयिक संबंधों को खत्म कर दिया। लेकिन कुछ महीनों बाद ही अमेरिकी कांग्रेस ने ताइवान के साथ अनौपचारिक संबंधों का ऐलान करते हुए ताइवान संबंध अधिनियम पारित किया। यह अधिनियम अमेरिका द्वारा ताइवान को हथियार बिक्री की अनुमति देता है। साथ ही अमेरिका चीनी हमले से ताइवान की रक्षा करने की संभावना को खारिज नहीं करता है।


ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन।

अमेरिका और चीन में आई खटास

अमेरिका ने 2007 से 2018 तक ताइवान को 25 बिलियन डॉलर से अधिक के हथियारों की बिक्री है। यह चीन और अमेरिका के रिश्तों के बीच खटास का कारण बना। ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन ने अपनी शपथ से पहले राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प से फोन पर बात की थी। यह 1979 के बाद पहली बार इतने बड़े स्तर पर दोनों देशों के बीच बात हुई थी। ट्रम्प प्रशासन ने भी ताइवान के साथ संबंधों को गहरा करते हुए कई हथियारों के सौदों का प्रस्ताव दिया और एक खुलासा किया ताइवान में अपने वास्तविक दूतावास के लिए 250 मिलियन डॉलर जारी किए हैं।

ताइवान का उदय

हान चीनी, खास तौर पर व्यापारी 17वीं शताब्दी में ताइवान पहुंचने लगे थे। मौजूदा वक्त में ताइवान में हान चीनी बड़ी संख्या में रहते हैं। इनमें से कई हान चीनी ताइवानी के तौर पर जाने जाने लगे हैं। ताइवान में इन लोगों की  आबादी 2% है। ताइवान 1600 के दशक के अंत में किंग राजवंश द्वारा विकसित किया गया था। इसे 1895 में चीन-जापान युद्ध के बाद हुई संधि के तौर पर जापान को सौंप दिया गया था। 1945 तक जापान ने इस पर शासन किया। इसके बाद यह आजाद हो गया। 

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चांग काई-शेक (1887-1975) एक राजनीतिज्ञ, सैन्य और चीनी तानाशाह, सदस्य और बाद में कुओमिन्तांग चीनी राष्ट्रवादी पार्टी के नेता थे।

रिपब्लिक ऑफ चाइना, जिसने चीन पर दशकों तक शासन किया, ने 1949 में कम्युनिस्टों से हारकर ताइवान की ओर रूख किया। चांग काइ शेक और उनकी पार्टी केएमटी इस बाद पर जोर देते रहे कि उनकी सरकार ताइवान और चीन दोनों जगहों पर सभी चीनी लोगों का प्रतिनिधित्व करती है। वाशिंगटन और अधिकांश पश्चिमी देश लंबे समय तक बीजिंग में कम्युनिस्ट सरकार को मान्यता देने से इनकार करते रहे। इन लोगों ने रिपब्लिक ऑफ चाइना को समर्थन दिया। लेकिन बाद में अधिकांश देश इससे पलट गए।

वाशिंगटन की स्थिति निक्सन प्रशासन के तहत स्थानांतरित होने लगी। बैक-चैनल कूटनीति के चलते 1979 में अमेरिका ने पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता दी। रिपब्लिक ऑफ चाइना ने 1971 में संयुक्त राष्ट्र में चीन का प्रतिनिधित्व करते हुए अपनी सीट खो दी। केएमटी ने 1949 से 1987 तक मार्शल लॉ के तहत ताइवान पर शासन किया। ताइवान ने 1992 में अपना पहला विधानसभा चुनाव और 1996 में राष्ट्रपति चुनाव कराया।

केएमटी और सहयोगी पार्टियां ताइवान को चीन के वन चाइना के तहत मानती रहीं। ये पार्टियां ताइवान की स्वतंत्रता के पक्ष में नहीं थीं। 2016 में विधानसभा चुनाव में केएमटी बहुमत हार गई। 


चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग।

राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने बढ़ाया दबाव

2012 में चीन में नेतृत्व परिवर्तन के बाद से, राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने हांगकांग, तिब्बत, शिनजियांग और ताइवान समेत सभी विवादित क्षेत्रों के लिए एक सख्त, राष्ट्रवादी रुख अपनाया है। लेकिन 2016 में ताइवान में राष्ट्रपति साई इंग-वेन के चुनाव जीतने के बाद से ताइवान और चीन के बीच संबंधों में और खटास आ गई। साई इंग-वेन ने बीजिंग से क्रॉस-स्ट्रेट संबंधों की भी करीब से जांच की तो वहीं शी जिनपिंग ने साई इंग-वेन पर दबाव डालने की कोशिश की, जिससे ताइवान पर प्रतिबंध बढ़ाए जा सकें। साई इंग-वेन ने 1992 के समझौते को मानने से इनकार कर दिया। इसके बाद चीन ने ताइवान संपर्क कार्यालय के साथ एक क्रॉस-स्ट्रेट संचार तंत्र को निलंबित कर दिया। चीन ने ताइवान के पर्यटन को प्रतिबंधित कर दिया है। साथ ही तमाम फ्लाइटें बंद कर दी गईं। अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं पर भी दबाव डाला गया कि वे ताइवान को चीन का प्रांत सूचीबद्ध करें।  

ताइवान को चीन से अगर अलग रहना है तो प्रमुख शक्तियों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ औपचारिक राजनयिक संबंधों को मजबूत बनाना होगा। हालांकि, अभी सिर्फ 15 देशों के ताइवान के साथ आधिकारिक राजनयिक संबंध हैं।

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